
51 शक्तिपीठ क्या हैं? उत्पत्ति की कथा और पूरी सूची
51 शक्तिपीठ क्या हैं? जानें सती की पौराणिक कथा, 4-18-51-52 की गिनती का रहस्य, हर शक्तिपीठ से जुड़ी देवी-भैरव की सूची और दर्शन का ज्योतिषीय महत्व।
What Are the 51 Shakti Peethas? Origin Story, Complete List & Spiritual Significance
भारतीय उपमहाद्वीप में देवी शक्ति की आराधना का सबसे विस्तृत और रहस्यमयी नेटवर्क है — शक्तिपीठ। ये वे पवित्र स्थान हैं जहाँ, पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी सती के शरीर के अंग पृथ्वी पर गिरे थे। आइए इस दिव्य भूगोल को विस्तार से समझते हैं।
शक्तिपीठ का अर्थ और मूल अवधारणा
- "शक्तिपीठ" शब्द दो भागों से बना है — शक्ति (देवी की ऊर्जा) और पीठ (आसन या बैठने का स्थान)।
- सरल शब्दों में, शक्तिपीठ का अर्थ है "देवी की ऊर्जा का बैठने का स्थान" — यानी वह भूमि जहाँ स्वयं आदिशक्ति प्रकट रूप में विराजमान मानी जाती हैं।
- ये स्थान केवल मंदिर नहीं, बल्कि तंत्र और शाक्त परंपरा के जीवंत ऊर्जा केंद्र माने जाते हैं।
- हर शक्तिपीठ में दो तत्व अनिवार्य रूप से पाए जाते हैं:
- शक्ति — देवी का स्थानीय स्वरूप (हर जगह अलग नाम और रूप)
- भैरव — भगवान शिव का रक्षक स्वरूप, जो हर पीठ की रक्षा करता है
- मान्यता है कि बिना भैरव के दर्शन के, शक्तिपीठ की यात्रा अधूरी मानी जाती है।
- हर पीठ किसी न किसी शारीरिक अंग या आभूषण से जुड़ा है — जीभ, आँख, हाथ, बाल, कमर की हड्डी तक — जो पूरी परंपरा को एक अनोखी सूक्ष्मता देता है।
सती की पौराणिक कथा — शक्तिपीठों की जड़
शक्तिपीठों की पूरी अवधारणा एक गहरी पौराणिक कथा पर आधारित है, जो पुराणों में वर्णित है।
- राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह किया।
- दक्ष इस विवाह से नाराज़ रहे और अपने मन में शिव के प्रति द्वेष पालते रहे।
- एक दिन दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया — लेकिन जानबूझकर शिव को निमंत्रण नहीं भेजा गया।
- सती बिना निमंत्रण के भी अपने पिता के घर यज्ञ में पहुँचीं, इस आशा के साथ कि शायद स्थिति सुधर जाए।
- यज्ञ स्थल पर दक्ष ने सबके सामने शिव का घोर अपमान किया।
- यह अपमान सती सहन नहीं कर पाईं। क्रोध, दुख और आत्मसम्मान की पीड़ा में उन्होंने स्वयं को यज्ञ की अग्नि में समर्पित कर दिया।
- इसी आत्म-बलिदान के कारण उन्हें "सती" नाम मिला, जो आज भी आत्मोत्सर्ग का प्रतीक माना जाता है।
- जब शिव को यह समाचार मिला, तो वे शोक और क्रोध से इतने व्याकुल हुए कि उन्होंने सती के अर्धदग्ध शरीर को अपने कंधे पर उठा लिया और तांडव नृत्य — विनाश का ब्रह्मांडीय नृत्य — शुरू कर दिया।
- शिव के इस रौद्र रूप से सृष्टि के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा।
- सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र चलाया, जिसने सती के शरीर को कई टुकड़ों में विभाजित कर दिया।
- शिव जैसे-जैसे पूरे उपमहाद्वीप में घूमते रहे, वैसे-वैसे सती के शरीर के अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरते गए।
- जहाँ-जहाँ ये अंग गिरे, वे स्थान पवित्र भूमि — यानी शक्तिपीठ — बन गए।
- इस प्रकार शक्तिपीठों का भूगोल दरअसल सती के शरीर के "मानचित्र" जैसा माना जाता है, जो हिमालय से लेकर श्रीलंका तक फैला है।
गिनती का विवाद — 4, 18, 51 या 52?
अक्सर लोग पूछते हैं कि शक्तिपीठ कुल कितने हैं। इसका सीधा उत्तर यह है कि कोई एक निश्चित, सर्वमान्य संख्या नहीं है — क्योंकि अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं ने इसे अलग-अलग तरीके से गिना है।
4 आदि शक्तिपीठ
- यह सबसे पुरानी और मूल परत मानी जाती है।
- इसमें चार मुख्य पीठों को शामिल किया जाता है:
- विमला देवी — पुरी, ओडिशा
- कामाख्या देवी — गुवाहाटी, असम
- कालीघाट (काली माता) — कोलकाता, पश्चिम बंगाल
- तारा तारिणी — गंजाम (बेरहामपुर के पास), ओडिशा
- इन्हें वह मूल केंद्र माना जाता है जहाँ से पूरी शाक्त परंपरा फैली।
18 महाशक्तिपीठ
- इस सूची को 8वीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने अपने प्रसिद्ध स्तोत्र "अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्रम्" में निर्धारित किया।
- "अष्टादश" का अर्थ ही "अठारह" होता है।
- इस स्तोत्र में शंकराचार्य ने अठारह देवियों और उनके आसनों के नाम गिनाए हैं — दक्षिण में श्रीलंका की शंकरी और कांचीपुरम की कामाक्षी से लेकर उत्तर में वाराणसी की विशालाक्षी और कश्मीर की शारदा तक।
- इनमें से तीन शक्तिपीठों को सर्वोच्च माना जाता है, क्योंकि ये देवी के तीन मूल कार्यों का प्रतीक हैं:
- कामाख्या — सृष्टि (उत्पत्ति) की प्रतीक
- गया — पालन की प्रतीक
- उज्जैन — संहार की प्रतीक
51 शक्तिपीठ
- यह सबसे विस्तृत और आमतौर पर सबसे अधिक प्रचलित सूची है।
- इसका मुख्य स्रोत है तंत्र चूड़ामणि (जिसे पीठनिर्णय या महापीठनिरूपण भी कहा जाता है), जो एक शाक्त तांत्रिक ग्रंथ है।
- इस ग्रंथ में इक्यावन आसनों को सूचीबद्ध किया गया है, जिसमें हर पीठ के साथ तीन जानकारियाँ दी गई हैं:
- सती के शरीर का कौन-सा अंग वहाँ गिरा
- उस स्थान की अधिष्ठात्री शक्ति (देवी)
- उस स्थान के रक्षक भैरव
- 51 की संख्या इसलिए भी लोकप्रिय हुई क्योंकि यह संस्कृत वर्णमाला के 51 अक्षरों से मेल खाती है — मान्यता है कि हर अक्षर देवी का एक स्वर (ध्वनि रूप) है।
52 शक्तिपीठ — यह संख्या कहाँ से आती है?
- कुछ पुराण, विशेष रूप से देवी भागवत पुराण, 52, 64 या यहाँ तक कि 108 पीठों का भी उल्लेख करते हैं।
- बंगाल की क्षेत्रीय परंपराओं में कभी-कभी कुछ स्थलों को अलग-अलग गिनकर या जोड़कर संख्या 52 तक पहुँचाई जाती है।
- कुछ ग्रंथों में इस बात पर भी मतभेद है कि श्रीलंका वाला शक्तिपीठ नैनातीवु में है या त्रिंकोमाली में — यह अंतर भी गिनती में फर्क ला देता है।
- इसलिए, अगर कोई स्रोत 52 कहता है, तो वह संभवतः किसी क्षेत्रीय या पौराणिक विस्तार का संदर्भ ले रहा है — यह गलत नहीं है, बस एक अलग परंपरा का हिस्सा है।
- निष्कर्ष यह है — 51 और 52 दोनों संख्याएँ प्रचलन में हैं, और दोनों को अलग-अलग ग्रंथों का समर्थन प्राप्त है।
शक्ति और भैरव — हर पीठ की जोड़ी अवधारणा
- शाक्त परंपरा में यह माना जाता है कि देवी अकेली नहीं रहतीं — हर स्थान पर शिव भी भैरव के रूप में रक्षक बनकर उपस्थित रहते हैं।
- यह अवधारणा दर्शाती है कि स्त्री-शक्ति और उसकी सुरक्षा दोनों एक साथ, एक ही स्थल पर विराजमान हैं।
- उदाहरण के लिए:
- कालीघाट में देवी दक्षिणा काली हैं, तो भैरव हैं नकुलेश्वर।
- विशालाक्षी (वाराणसी) की रक्षा करते हैं काल भैरव।
- हिंगलाज माता के भैरव हैं भीमलोचन।
- पारंपरिक मान्यता है कि पूर्ण फल प्राप्ति के लिए देवी के साथ-साथ भैरव के भी दर्शन आवश्यक माने जाते हैं।
सती के अंगों से जुड़ाव — हर पीठ की पहचान
- हर शक्तिपीठ सती के किसी विशेष शारीरिक अंग या आभूषण से पहचाना जाता है।
- कुछ प्रमुख उदाहरण:
- ज्वालामुखी (हिमाचल प्रदेश) — जीभ
- कामाख्या (असम) — योनि (गर्भ)
- कालीघाट (कोलकाता) — दाहिने पैर की उँगलियाँ
- हिंगलाज (पाकिस्तान) — सिर का ऊपरी भाग (ब्रह्मरंध्र)
- विशालाक्षी (वाराणसी) — कान का आभूषण
- शारदा (PoK) — दाहिना हाथ
- यह बारीकी शक्तिपीठों की परंपरा को अन्य तीर्थों से अलग बनाती है, क्योंकि हर स्थान का एक विशिष्ट, अनोखा संबंध सती के शरीर से जुड़ा है।
सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध शक्तिपीठ
यदि सभी 51 स्थानों को याद रखना कठिन लगे, तो ये कुछ सबसे प्रमुख शक्तिपीठ हैं जिन्हें हर भक्त को जानना चाहिए:
- कामाख्या देवी (गुवाहाटी, असम)सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ, सृष्टि और रजस्वला ऊर्जा का प्रतीक
- यहाँ हर वर्ष आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला तांत्रिक साधकों के बीच विशेष महत्व रखता है
- कालीघाट (कोलकाता, पश्चिम बंगाल)इसी मंदिर के नाम पर शहर का नाम "कोलकाता" पड़ा
- देवी दक्षिणा काली के रूप में पूजी जाती हैं
- विशालाक्षी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)गंगा तट पर स्थित, अष्टादश महाशक्तिपीठों में शामिल
- ज्वाला जी / ज्वालामुखी (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश)यहाँ कोई मूर्ति नहीं है — केवल चट्टान से स्वाभाविक रूप से निकलती नौ ज्वालाएँ पूजी जाती हैं
- हिंगलाज माता (बलूचिस्तान, पाकिस्तान)पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिंदू तीर्थ स्थल
- वार्षिक "हिंगलाज यात्रा" में भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं
- शारदा पीठ (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर)प्राचीन काल में विद्या और ज्ञान का बड़ा केंद्र था
- वर्तमान में नियंत्रण रेखा के पास खंडहर अवस्था में है
- 2023 में कुपवाड़ा, जम्मू-कश्मीर में एक नया शारदा मंदिर स्थापित किया गया
51 शक्तिपीठों की पूरी सूची
नीचे दी गई सूची में हर शक्तिपीठ का नाम, स्थान, देवी और भैरव दिया गया है:
क्र. शक्तिपीठ स्थान अधिष्ठात्री शक्ति (देवी) भैरव 1 कोट्टरी (हिंगलाज माता) बलूचिस्तान, पाकिस्तान हिंगलाज / कोट्टरी भीमलोचन 2 शारदा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर शारदा (सरस्वती) शारदा भैरव 3 महामाया अमरनाथ, जम्मू-कश्मीर महामाया त्रिसंध्येश्वर 4 ज्वाला जी कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश ज्वालामुखी उन्मत्त 5 ब्रजेश्वरी कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश ब्रजेश्वरी लाल भैरव 6 छिन्नमस्तिका चिंतपूर्णी, हिमाचल प्रदेश छिन्नमस्तिका रुद्र महादेव 7 भद्रकाली कुरुक्षेत्र, हरियाणा भद्रकाली स्थाणु 8 त्रिपुरमालिनी जालंधर, पंजाब त्रिपुरमालिनी भीषण 9 विशालाक्षी वाराणसी, उत्तर प्रदेश विशालाक्षी काल भैरव 10 पंचसागर (वाराही) वाराणसी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश वाराही विघ्नेश्वर 11 ललिता / माधवेश्वरी प्रयागराज, उत्तर प्रदेश ललिता भव 12 कात्यायनी वृंदावन, उत्तर प्रदेश कात्यायनी भूतेश 13 शिवानी रामगिरि, उत्तर प्रदेश शिवानी चंड 14 अवंती (महाकाली) उज्जैन, मध्य प्रदेश अवंती / महाकाली लंबकर्ण 15 मंगल चंडिका उज्जैन, मध्य प्रदेश मंगल चंडिका कपिलांबर 16 शारदा (मैहर) मैहर, मध्य प्रदेश शारदा काल भैरव 17 कालमाधव अमरकंटक, मध्य प्रदेश काली असितांग 18 नर्मदा (शोण) अमरकंटक, मध्य प्रदेश शोण / नर्मदा भद्रसेन 19 दंतेश्वरी बस्तर (दंतेवाड़ा), छत्तीसगढ़ दंतेश्वरी कपाल भैरव 20 त्रिपुर सुंदरी उदयपुर, त्रिपुरा त्रिपुर सुंदरी त्रिपुरेश 21 कामाख्या गुवाहाटी, असम कामाख्या उमानंद 22 जयंती नारतियांग, मेघालय जयंतेश्वरी क्रमादीश्वर 23 तारा तारिणी गंजाम, ओडिशा तारा और तारिणी सोमेश्वर / उदयेश्वर 24 विमला (बिमला) पुरी, ओडिशा विमला जगन्नाथ 25 कालीघाट कोलकाता, पश्चिम बंगाल दक्षिणा काली नकुलेश्वर 26 योगाद्या खीरग्राम, पश्चिम बंगाल योगाद्या क्षीरखंडक 27 बहुला केतुग्राम, पश्चिम बंगाल बहुला भिरुक 28 कंकालीतला बोलपुर, पश्चिम बंगाल देवगर्भा / कंकालेश्वरी रुरु 29 फुल्लरा अट्टहास, पश्चिम बंगाल फुल्लरा विश्वेश 30 रत्नावली हुगली, पश्चिम बंगाल कुमारी घंटेश्वर 31 महिषासुरमर्दिनी बक्रेश्वर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल महिषासुरमर्दिनी वक्रनाथ 32 नंदिकेश्वरी सैंथिया, बीरभूम, पश्चिम बंगाल नंदिनी / नंदिकेश्वरी नंदिकेश्वर 33 किरीटेश्वरी मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल किरीटेश्वरी / विमला संवर्त 34 बर्गभीमा तमलुक, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल भीमरूपा / भीमकाली सर्वानंद 35 भ्रामरी (सप्तश्रृंगी) नासिक, महाराष्ट्र भ्रामरी / सप्तश्रृंगी विकृताक्ष 36 महाकाली (कालिका) पावागढ़, गुजरात कालिका लकुलीश 37 चंद्रभागा प्रभास (वेरावल), गुजरात चंद्रभागा वक्रतुंड 38 भ्रामरांबा श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश भ्रामरांबा संवरानंद 39 विश्वेश्वरी (गोदावरी) राजमुंदरी, आंध्र प्रदेश विश्वेश्वरी / राकिनी दंडपाणि / वत्सनाभ 40 चामुंडेश्वरी मैसूरु, कर्नाटक चामुंडेश्वरी महाबलेश्वर 41 देवगर्भा (कामाक्षी) कांचीपुरम, तमिलनाडु कामाक्षी रुरु 42 सर्वाणी (कन्याश्रम) कन्याकुमारी, तमिलनाडु सर्वाणी निमिष 43 गंडकी चंडी मुक्तिनाथ, नेपाल गंडकी चंडी चक्रपाणि 44 गुह्येश्वरी काठमांडू, नेपाल गुह्येश्वरी / महामाया कपाली 45 दाक्षायणी मानसरोवर, तिब्बत दाक्षायणी / मनसा अमर 46 भवानीपुर करतोया (बोगरा), बांग्लादेश अपर्णा वामन 47 जैशोरेश्वरी जैसोर, बांग्लादेश जैशोरेश्वरी चंड 48 सुगंधा शिकारपुर (बारिसाल), बांग्लादेश सुगंधा / सुनंदा त्र्यंबक 49 शिवहरकराय कराची, पाकिस्तान महिषासुरमर्दिनी क्रोधीश 50 चट्टल भवानी चटगाँव, बांग्लादेश भवानी चंद्रशेखर 51 इंद्राक्षी नैनातीवु, श्रीलंका इंद्राक्षी / नागपूषणी राक्षसेश्वर कुछ प्रविष्टियाँ पारंपरिक रूप से विवादित हैं — जैसे श्रीलंका वाला पीठ नैनातीवु में है या त्रिंकोमाली में। जहाँ मतभेद है, वहाँ अलग-अलग परंपराओं को समान रूप से मान्य समझा जाना चाहिए।
शक्तिपीठों का भौगोलिक विस्तार
- शक्तिपीठों की परंपरा किसी एक देश तक सीमित नहीं है — यह छह आधुनिक देशों में फैली हुई है:
- भारत — सर्वाधिक संख्या में शक्तिपीठ, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और पूर्वी क्षेत्र में
- पाकिस्तान — हिंगलाज माता, शिवहरकराय
- पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर — शारदा पीठ
- बांग्लादेश — सुगंधा, भवानीपुर, जैशोरेश्वरी, चट्टल भवानी
- नेपाल — गंडकी चंडी, गुह्येश्वरी
- तिब्बत (चीन) — मानसरोवर के पास दाक्षायणी
- श्रीलंका — इंद्राक्षी
- यह विस्तार दिखाता है कि सती की कथा और शाक्त परंपरा आधुनिक राजनीतिक सीमाओं से कहीं पुरानी और व्यापक है।
- यही कारण है कि शक्तिपीठ केवल धार्मिक तीर्थ नहीं, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप की साझा सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक माने जाते हैं।
शक्तिपीठ दर्शन का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व
- शाक्त परंपरा में यह विश्वास है कि शक्तिपीठ दर्शन से भक्त को देवी की प्रत्यक्ष कृपा प्राप्त होती है।
- ज्योतिषीय दृष्टि से भी शक्तिपीठ यात्रा को विशेष माना जाता है:
- जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा, मंगल या राहु से जुड़ी परेशानियाँ हों, उनके लिए शक्तिपीठ दर्शन शुभ माना जाता है
- स्त्री ग्रहों (चंद्र, शुक्र) से जुड़े दोष निवारण के लिए भी देवी उपासना का महत्व बताया गया है
- मांगलिक दोष, संतान बाधा, या मानसिक अशांति में शक्तिपीठ दर्शन और देवी मंत्र जाप का सुझाव पारंपरिक ज्योतिष में दिया जाता है
- नवरात्रि के नौ दिनों में शक्तिपीठ दर्शन को विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
- हर शक्तिपीठ में तंत्र और मंत्र की अपनी अलग साधना परंपरा है, जिसे स्थानीय पुजारियों या गुरु परंपरा से ही सीखा जाना उचित माना जाता है।
यात्रा से जुड़ी सामान्य बातें
- सभी 51 शक्तिपीठों की यात्रा एक जीवनकाल में पूरी करना अधिकांश भक्तों के लिए कठिन है — इसलिए भक्त अक्सर:
- अपने निकटतम क्षेत्र के शक्तिपीठों से शुरुआत करते हैं
- 18 महाशक्तिपीठों को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि यह एक सुव्यवस्थित और प्रामाणिक सूची है
- विशेष अवसरों (नवरात्रि, अंबुबाची मेला) पर प्रमुख पीठों की यात्रा करते हैं
- सीमा पार स्थित शक्तिपीठों (पाकिस्तान, बांग्लादेश, तिब्बत) की यात्रा वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के कारण सीमित या कठिन है — ऐसे में भक्त शास्त्रों और कथाओं के माध्यम से ही श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
- भारत के भीतर स्थित अधिकांश शक्तिपीठ रेल और सड़क मार्ग से भली-भाँति जुड़े हैं।
निष्कर्ष
शक्तिपीठों की परंपरा भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन, विस्तृत और भावनात्मक रूप से गहरी धार्मिक धरोहरों में से एक है। चाहे संख्या 51 हो, 52 हो या 18 — हर सूची अपने-अपने ग्रंथ और परंपरा में सत्य है। महत्वपूर्ण यह नहीं कि गिनती क्या है, बल्कि यह है कि यह परंपरा शक्ति, भक्ति और भूगोल को एक साथ जोड़कर एक ऐसा मानचित्र बनाती है जो आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शक्तिपीठ कितने हैं, 51 या 52? तंत्र चूड़ामणि के अनुसार 51 शक्तिपीठ हैं, जबकि कुछ बंगाली और पौराणिक परंपराएँ 52 गिनती हैं। देवी भागवत पुराण 64 और 108 तक का भी उल्लेख करता है। कोई एक आधिकारिक संख्या नहीं है।
18 और 51 शक्तिपीठों में क्या अंतर है? 18 महाशक्तिपीठ आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्रम् से आते हैं और सबसे पूजनीय उपसमूह माने जाते हैं। 51 की सूची तंत्र चूड़ामणि से ली गई एक व्यापक सूची है।
सबसे महत्वपूर्ण शक्तिपीठ कौन-सा है? असम की कामाख्या देवी को सबसे प्रमुख माना जाता है, जो सृजन-शक्ति का प्रतीक हैं और 4 आदि तथा 18 महाशक्तिपीठ, दोनों सूचियों में शामिल हैं।
क्या सभी शक्तिपीठ भारत में स्थित हैं? नहीं। ये भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और तिब्बत — छह आधुनिक देशों में फैले हुए हैं।
शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग में क्या अंतर है? ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 प्रमुख पवित्र स्थान हैं, जबकि शक्तिपीठ देवी शक्ति (सती/पार्वती) से जुड़े पवित्र स्थान हैं। कुछ स्थान, जैसे श्रीशैलम, दोनों परंपराओं में एक साथ आते हैं।
लेखक: Admin
श्रेणी: पूजा और तीर्थ
प्रकाशन तिथि: 12 सितंबर 2026
स्थिति: प्रकाशित
