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दशगात्र क्रिया में कितने पिंडदान किए जाते हैं? जानें सम्पूर्ण विधि और महत्व

दशगात्र क्रिया में कितने पिंडदान किए जाते हैं? जानें सम्पूर्ण विधि और महत्व

दशगात्र क्रिया में कितने पिंडदान किए जाते हैं? जानिए दशगात्र की सम्पूर्ण विधि, प्रत्येक पिंडदान का महत्व और सही नियम

दशगात्र क्रिया में कितने पिंडदान किए जाते हैं? जानें सम्पूर्ण विधि और महत्व

हिंदू धर्म में मृत्यु के पश्चात किए जाने वाले क्रिया-कर्मों में दशगात्र क्रिया का विशेष महत्व है। यह क्रिया मृत्यु के दसवें दिन संपन्न की जाती है और इसे मृतक की आत्मा के सूक्ष्म शरीर के निर्माण से जोड़कर देखा जाता है। बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न रहता है कि आखिर दशगात्र क्रिया में कितने पिंडदान किए जाते हैं, और इनका आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

गरुड़ पुराण और अन्य धर्मशास्त्रों में दशगात्र क्रिया का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें बताया गया है कि किस प्रकार क्रमशः पिंडदान करने से आत्मा को एक नया, पूर्ण सूक्ष्म शरीर प्राप्त होता है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि दशगात्र क्रिया क्या है, इसमें कितने और किस क्रम में पिंडदान किए जाते हैं, तथा इस अनुष्ठान का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व क्या है।

दशगात्र क्रिया क्या है?

"दशगात्र" शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — "दश" अर्थात दस, और "गात्र" अर्थात शरीर के अंग। अतः दशगात्र क्रिया का शाब्दिक अर्थ है — दस अंगों से युक्त शरीर के निर्माण की प्रक्रिया। यह क्रिया मृत्यु के प्रथम दिन से लेकर दसवें दिन तक प्रतिदिन की जाती है, जिसमें प्रत्येक दिन एक पिंड अर्पित किया जाता है।

दशगात्र क्रिया में कितने पिंडदान किए जाते हैं?

गरुड़ पुराण एवं गरुड़ पुराण पर आधारित धार्मिक परंपराओं के अनुसार, दशगात्र क्रिया में कुल 10 पिंडदान किए जाते हैं — एक पिंडदान प्रतिदिन, मृत्यु के पहले दिन से लेकर दसवें दिन तक। मान्यता है कि प्रत्येक पिंडदान से आत्मा के सूक्ष्म शरीर का एक विशेष अंग विकसित होता है, और दसवें दिन तक आत्मा का यह सूक्ष्म शरीर पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है।

प्रतिदिन के पिंडदान और उनसे विकसित होने वाले अंग

पारंपरिक मान्यता के अनुसार, प्रत्येक दिन के पिंडदान से आत्मा के भिन्न-भिन्न अंगों का निर्माण होता है:

  1. पहला दिन – सिर का निर्माण
  2. दूसरा दिन – गर्दन और कंधों का निर्माण
  3. तीसरा दिन – हृदय और छाती का निर्माण
  4. चौथा दिन – पीठ का निर्माण
  5. पांचवां दिन – नाभि और उदर का निर्माण
  6. छठा दिन – कमर का निर्माण
  7. सातवां दिन – जांघों का निर्माण
  8. आठवां दिन – घुटनों का निर्माण
  9. नौवां दिन – पैरों और टखनों का निर्माण
  10. दसवां दिन – अंतिम रूप से शरीर की पूर्णता एवं भूख-प्यास की तृप्ति

यह क्रम विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में थोड़ा भिन्न भी हो सकता है, परंतु मूल भावना यही रहती है कि प्रतिदिन एक पिंडदान से आत्मा का सूक्ष्म शरीर क्रमशः पूर्णता की ओर बढ़ता है।

दशगात्र क्रिया क्यों आवश्यक मानी गई है?

गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा का शरीर अत्यंत सूक्ष्म और अधूरा होता है। इस अवस्था में आत्मा को न तो ठीक से चलने-फिरने की क्षमता होती है और न ही भूख-प्यास सहन करने की शक्ति। दशगात्र क्रिया के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि आत्मा को यमलोक की आगे की यात्रा हेतु एक सक्षम और पूर्ण शरीर प्राप्त हो, जिससे उसे कष्ट न उठाना पड़े।

दशगात्र क्रिया की सही विधि

दशगात्र क्रिया को संपन्न करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन पारंपरिक रूप से किया जाता है:

  • यह क्रिया प्रतिदिन एक निश्चित समय पर, सामान्यतः प्रातःकाल की जाती है।
  • पिंड बनाने के लिए चावल, जौ का आटा, तिल और शहद जैसी सामग्री का उपयोग किया जाता है।
  • प्रत्येक दिन का पिंड मृतक के नाम व गोत्र का उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक अर्पित किया जाता है।
  • यह क्रिया परिवार के सबसे नजदीकी पुरुष सदस्य (सामान्यतः पुत्र) द्वारा संपन्न की जाती है, हालांकि परिस्थिति अनुसार अन्य सदस्य भी यह कर सकते हैं।
  • क्रिया के दौरान शुद्धता, सात्विकता और मौन का विशेष ध्यान रखा जाता है।
  • दसवें दिन विशेष रूप से मुंडन संस्कार भी संपन्न किया जाता है।

दशगात्र के पश्चात की क्रियाएं

दशगात्र क्रिया पूर्ण होने के बाद अगले महत्वपूर्ण अनुष्ठान इस प्रकार हैं:

  • एकादशाह (11वां दिन): इस दिन विशेष शुद्धिकरण पूजन एवं ब्राह्मण भोज का आयोजन किया जाता है।
  • द्वादशाह (12वां दिन): सपिंडीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है, जिसमें मृतक आत्मा को पितरों के समूह में सम्मिलित किया जाता है।
  • त्रयोदशाह (13वां दिन): इसे "तेरहवीं" कहा जाता है, जिसमें अंतिम पिंडदान, हवन-पूजन एवं भोज संपन्न होता है, और यहीं से मृतक आत्मा की यमलोक यात्रा पूर्ण मानी जाती है।

दशगात्र क्रिया का आध्यात्मिक महत्व

दशगात्र क्रिया केवल एक कर्मकांड मात्र नहीं है, बल्कि यह हमें यह सिखाती है कि जीवन और मृत्यु का चक्र किस प्रकार परस्पर जुड़ा हुआ है। यह क्रिया परिवारजनों को अपने प्रियजन के प्रति अंतिम कर्तव्य निभाने का अवसर देती है, साथ ही उन्हें यह भी स्मरण कराती है कि जीवन नश्वर है और हमें अपने कर्मों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए।

गरुड़ पुराण के अनुसार, जो परिवार श्रद्धा और नियमपूर्वक यह क्रिया संपन्न करता है, उस पर पितरों की विशेष कृपा बनी रहती है, और मृतक आत्मा को शीघ्र सद्गति प्राप्त होती है।

किन बातों का रखें विशेष ध्यान?

  • दशगात्र क्रिया को किसी योग्य एवं अनुभवी पंडित के मार्गदर्शन में ही संपन्न करवाएं।
  • प्रतिदिन की क्रिया में निरंतरता बनाए रखें, बीच में क्रम न टूटे इसका विशेष ध्यान रखें।
  • पिंड बनाने की सामग्री शुद्ध व ताज़ा होनी चाहिए।
  • इस दौरान परिवार के सदस्यों को सात्विक आहार व सादगीपूर्ण जीवनशैली अपनानी चाहिए।
  • यदि किसी कारणवश प्रतिदिन क्रिया करना संभव न हो, तो पंडित से परामर्श कर वैकल्पिक विधि अपनाई जा सकती है।

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निष्कर्ष

दशगात्र क्रिया में कुल दस पिंडदान किए जाते हैं, जो मृत्यु के प्रथम दिन से लेकर दसवें दिन तक प्रतिदिन एक-एक करके संपन्न किए जाते हैं। मान्यता है कि इन पिंडदानों से आत्मा के सूक्ष्म शरीर का क्रमिक निर्माण होता है, जिससे उसे आगे की यमलोक यात्रा में सुगमता प्राप्त होती है। यह अनुष्ठान न केवल मृतक आत्मा की सद्गति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि परिवारजनों को अपने कर्तव्य निभाने का अवसर भी प्रदान करता है। श्रद्धा, नियम और सही विधि से संपन्न की गई दशगात्र क्रिया समस्त परिवार के लिए शांति और पितरों का आशीर्वाद लेकर आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: दशगात्र क्रिया में कितने पिंडदान किए जाते हैं? दशगात्र क्रिया में कुल दस पिंडदान किए जाते हैं, मृत्यु के पहले दिन से लेकर दसवें दिन तक प्रतिदिन एक पिंडदान। मान्यता है कि इससे आत्मा के सूक्ष्म शरीर का क्रमिक निर्माण होता है।

प्रश्न 2: दशगात्र क्रिया कब से शुरू होती है? दशगात्र क्रिया मृत्यु के पहले दिन से ही आरंभ हो जाती है और लगातार दस दिनों तक प्रतिदिन एक पिंडदान के साथ जारी रहती है, जो दसवें दिन पूर्ण होती है।

प्रश्न 3: दशगात्र क्रिया कौन करता है? यह क्रिया सामान्यतः मृतक के निकटतम पुरुष सदस्य, प्रायः पुत्र द्वारा संपन्न की जाती है। परिस्थिति अनुसार परिवार के अन्य योग्य सदस्य भी पंडित के मार्गदर्शन में यह क्रिया कर सकते हैं।

प्रश्न 4: दशगात्र क्रिया के बाद कौन-सी क्रिया की जाती है? दशगात्र क्रिया के बाद एकादशाह (11वां दिन), द्वादशाह (12वां दिन, सपिंडीकरण) और त्रयोदशाह (13वां दिन, तेरहवीं) क्रियाएं क्रमशः संपन्न की जाती हैं।

प्रश्न 5: दशगात्र क्रिया न करने से क्या हो सकता है? मान्यता है कि दशगात्र क्रिया न करने से आत्मा का सूक्ष्म शरीर अपूर्ण रह जाता है, जिससे उसे यमलोक यात्रा में अधिक कष्ट सहना पड़ सकता है और सद्गति में विलंब हो सकता है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

इस लेख में दी गई जानकारी गरुड़ पुराण एवं पारंपरिक हिंदू धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। astropujatirth.com स्पष्ट करता है कि यह विषय पूर्णतः आध्यात्मिक व सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। पाठकों से अनुरोध है कि इसे श्रद्धा व परंपरा के दृष्टिकोण से देखें। किसी भी क्रिया-कर्म, श्राद्ध अथवा धार्मिक अनुष्ठान से पूर्व योग्य पंडित या आचार्य से परामर्श अवश्य करें। astropujatirth.com इस जानकारी के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए उत्तरदायी नहीं होगा।

यदि यह विषय पढ़ते समय आपको किसी अपने प्रियजन की हाल की क्षति से जुड़ी गहरी उदासी या भावनात्मक कष्ट महसूस हो रहा हो, तो कृपया अपने परिवार, मित्रों अथवा किसी काउंसलर से बात करें — आप अकेले नहीं हैं।

लेखक: Admin

श्रेणी: सनातन ज्ञान

प्रकाशन तिथि: 19 जुलाई 2026

स्थिति: प्रकाशित