
गणपतिस्तवः: त्रिदेव द्वारा रचित वह "स्तोत्रराज" जिसे स्वयं गणेश ने यह उपाधि दी
गणेश पुराण में वर्णित गणपतिस्तवः (ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर रचित, ब्रह्मा द्वारा वर्णित) का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ जानें। स्वयं गणेश जी द्वारा "स्तोत्रराज" घोषित यह अद्वितीय स्तवन।
Ganapati Stavah: The Stotra-Raja Composed by the Trimurti
जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों मिलकर गणपति की शरण में गए
यह लेख शुरू करने से पहले एक स्पष्टीकरण आवश्यक है — पारंपरिक स्रोतों में विशुद्ध रूप से "अकेले ब्रह्मा द्वारा रचित" कोई पृथक गणेश-स्तुति उपलब्ध नहीं है। परंतु गणेश पुराण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दुर्लभ स्तोत्र वर्णित है, जिसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर — त्रिदेव ने संयुक्त रूप से रचा, और जिसे ब्रह्मा जी ने स्वयं वर्णित किया ("ब्रह्मोवाच")। यह स्तोत्र गणपतिस्तवः के नाम से जाना जाता है, और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि स्वयं भगवान गणेश इससे इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने इसे "स्तोत्रराज" अर्थात "स्तोत्रों का राजा" घोषित कर दिया।
यह प्रसंग अपने आप में अत्यंत असाधारण है — जब सृष्टि, स्थिति और लय के तीनों अधिष्ठाता देवता स्वयं मिलकर किसी एक देवता की स्तुति करें, तो यह उस देवता की सर्वोच्चता का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है। यह स्तोत्र गणेश पुराण के उपासना खंड के 13वें अध्याय में वर्णित है।
गणपतिस्तवः — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित
श्लोक १-४: गणेश का निराकार-निर्गुण ब्रह्म-स्वरूप
ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऊचुः ।
अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं निरालम्बमद्वैतमानन्दपूर्णम् ।
परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ १॥
गुणातीतमाद्यं चिदानन्दरूपं चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम् ।
मुनिध्येयमाकाशरूपं परेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ २॥
जगत्कारणं कारणाज्ञानहीनं सुरादिं सुखादिं युगादिं गणेशम् ।
जगद्व्यापिनं विश्ववन्द्यं सुरेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ ३॥
रजोयोगतो ब्रह्मरूपं श्रुतिज्ञं सदा कार्यसक्तं हृदाऽचिन्त्यरूपम् ।
जगत्कारकं सर्वविद्यानिधानं सदा ब्रह्मरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ४॥
हिंदी अर्थ: ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ने कहा — जो अजन्मा, निर्विकल्प, निराकार, एक, निरालंब (किसी सहारे के बिना स्वतः स्थित), अद्वैत और आनंद से परिपूर्ण हैं; जो परम निर्गुण, निर्विशेष और इच्छा-रहित हैं — उन परब्रह्म-स्वरूप गणेश को हम भजते हैं। जो गुणों से परे, आदि, चिदानंद-स्वरूप, चेतना के प्रकाशक, सर्वव्यापी और केवल ज्ञान से प्राप्त होने योग्य हैं; जो मुनियों द्वारा ध्यान किए जाने योग्य, आकाश-स्वरूप, परमेश्वर हैं — उन परब्रह्म-स्वरूप गणेश को हम भजते हैं। जो जगत के कारण हैं, जो अज्ञान के कारण से रहित हैं, जो देवताओं के आदि, सुखों के आदि और युगों के आदि हैं; जो जगत में व्याप्त, विश्व द्वारा वंदनीय और देवताओं के स्वामी हैं — उन परब्रह्म-स्वरूप गणेश को हम भजते हैं। जो रजोगुण के योग से ब्रह्मा-स्वरूप धारण करते हैं, जो वेदों के ज्ञाता हैं, जो सदा कार्य में संलग्न रहते हैं, जिनका स्वरूप हृदय से भी अचिंत्य है, जो जगत के रचयिता और समस्त विद्याओं के भंडार हैं — उन सदा ब्रह्म-स्वरूप गणेश को हम नमन करते हैं।
श्लोक ५-७: विष्णु, शिव-स्वरूप में गणेश
सदा सत्त्वयोगं मुदा क्रीडमानं सुरारीन् हरन्तं जगत्पालयन्तम् ।
अनेकावतारं निजाज्ञानहारं सदा विष्णुरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ५॥
तमोयोगिनं रुद्ररूपं त्रिनेत्रं जगद्धारकं तारकं ज्ञानहेतुम् ।
अनेकागमैः स्वं जनं बोधयन्तं सदा शर्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ६॥
तमःस्तोमहारं जनाज्ञानहारं त्रयीवेदसारं परब्रह्मपारम् ।
मुनिज्ञानकारं विदूरे विकारं सदा ब्रध्नरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ७॥
हिंदी अर्थ: जो सदा सत्त्वगुण के योग से आनंदपूर्वक क्रीड़ा करते हैं, जो देवताओं के शत्रुओं का नाश करते हैं, जो जगत का पालन करते हैं, जो अनेक अवतार धारण करते हैं, जो अपने भक्तों के अज्ञान को हरने वाले हैं — उन सदा विष्णु-स्वरूप गणेश को हम नमन करते हैं। जो तमोगुण से युक्त रुद्र-स्वरूप हैं, जो त्रिनेत्र हैं, जो जगत को धारण करने वाले, संसार-सागर से पार कराने वाले और ज्ञान के हेतु हैं, जो अनेक आगमों (शास्त्रों) के माध्यम से अपने भक्तों को बोध कराते हैं — उन सदा शिव-स्वरूप गणेश को हम नमन करते हैं। जो अंधकार के समूह और जनों के अज्ञान को हरने वाले हैं, जो तीनों वेदों का सार हैं, जो परब्रह्म से भी परे हैं, जो मुनियों में ज्ञान उत्पन्न करने वाले हैं, जो विकारों से अत्यंत दूर हैं — उन सदा सूर्य-स्वरूप गणेश को हम नमन करते हैं।
श्लोक ८-१०: चंद्र, तत्त्व और सृष्टि-स्वरूप
निजैरौषधैस्तर्पयन्तं करोघैः सुरौघान्कलाभिः सुधास्राविणीभिः ।
दिनेशांशुसन्तापहारं द्विजेशं शशाङ्कस्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ८॥
प्रकाशस्वरूपं नभोवायुरूपं विकारादिहेतुं कलाकालभूतम् ।
अनेकक्रियानेकशक्तिस्वरूपं सदा शक्तिरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ९॥
प्रधानस्वरूपं महत्तत्त्वरूपं धरावारिरूपं दिगीशादिरूपम् ।
असत्सत्स्वरूपं जगद्धेतुभूपं सदा विश्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ १०॥
हिंदी अर्थ: जो अपनी औषधियों की किरणों से देवताओं को तृप्त करते हैं, जो अमृत बरसाने वाली कलाओं से युक्त हैं, जो सूर्य की किरणों के ताप को हरने वाले, ब्राह्मणों के स्वामी हैं — उन सदा चंद्र-स्वरूप गणेश को हम नमन करते हैं। जो प्रकाश-स्वरूप, आकाश-वायु-स्वरूप हैं, जो विकारों के कारण हैं, जो काल की कलाओं के मूल हैं, जो अनेक क्रियाओं और अनेक शक्तियों के स्वरूप हैं — उन सदा शक्ति-स्वरूप गणेश को हम नमन करते हैं। जो प्रधान (प्रकृति) स्वरूप, महत्तत्त्व-स्वरूप, पृथ्वी-जल-स्वरूप, दिशाओं के स्वामी-स्वरूप हैं, जो असत् और सत् दोनों के स्वरूप हैं, जो जगत के मूल कारण हैं — उन सदा विश्व-स्वरूप गणेश को हम नमन करते हैं।
श्लोक ११-१३: शरणागति और गणेश की कृपा
त्वदीये मनः स्थापयेदङ्घ्रियुग्मे जनो विघ्नसङ्घान्न पीडां लभेत ।
लसत्सूर्यबिम्बे विशाले स्थितेऽयं जनो ध्वान्तबाधां कथं वा लभेत ॥ ११॥
वयं भ्रामिताः सर्वथाऽज्ञानयोगादलब्ध्वा तवाङ्घ्रिं बहून्वर्षपूगान् ।
इदानीमवाप्तास्तवैव प्रसादात्प्रपन्नान्सदा पाहि विश्वम्भराद्य ॥ १२॥
ब्रह्मोवाच ।
एवं स्तुतो गणेशस्तु सन्तुष्टोऽभून्महामुने ।
कृपया परयोपेतोऽभिधातुं तान् प्रचक्रमे ॥ १३॥
हिंदी अर्थ: जो मनुष्य अपने मन को आपके दोनों चरणों में स्थापित करता है, वह विघ्नों के समूह से कभी पीड़ित नहीं होता। जिस प्रकार विशाल, प्रकाशमान सूर्य-बिंब के स्थित रहने पर अंधकार की बाधा कैसे हो सकती है, उसी प्रकार आपकी शरण में गया व्यक्ति कैसे कष्ट पा सकता है? हम सब सर्वथा अज्ञान के कारण भ्रमित होकर, बहुत वर्षों तक आपके चरणों को प्राप्त नहीं कर सके। अब आपकी ही कृपा से हमें आपके चरण प्राप्त हुए हैं। हे विश्वंभर! हम शरणागतों की सदा रक्षा कीजिए। ब्रह्मा जी ने कहा — हे महामुने! इस प्रकार स्तुति किए जाने पर गणेश जी अत्यंत संतुष्ट हुए, और परम कृपा से युक्त होकर उन्हें (त्रिदेव को) संबोधित करने लगे।
फलश्रुति — गणेश जी द्वारा "स्तोत्रराज" की उपाधि
गणेश उवाच ।
यदर्थं क्लेशिता यूयं यदर्थमिह चागताः ।
प्रीतोऽहमनया स्तुत्या वरं मत्तो वृणीत तम् ॥ १४॥
कृतञ्च मम यत् स्तोत्रं भवद्भिर्भावितात्मभिः ।
स्तोत्रराजमितिख्यातं भविष्यति ममाज्ञया ॥ १५॥
इदं यः पठेत् प्रातरुत्थाय धीमान् स्त्रिसन्ध्यं सदा भक्तियुक्तो विशुद्धः ।
स पुत्रान् श्रियं सर्वकामान् लभेत परब्रह्मरूपो भवेदन्तकाले ॥ १६॥
इति गणेशपुराण उपासनाखण्डे त्रयोदशोऽध्याये
ब्रह्मविष्णुमहेश्वराकृतो गणपतिस्तवः सम्पूर्णः ॥
हिंदी अर्थ: गणेश जी ने कहा — जिस उद्देश्य के लिए तुम कष्ट उठाकर यहां आए हो, उससे मैं प्रसन्न हूं। इस स्तुति से संतुष्ट होकर मैं तुम्हें वर देता हूं, जो चाहो मुझसे मांग लो। तुम भावित-आत्मा वालों द्वारा रचित यह मेरा स्तोत्र मेरी आज्ञा से "स्तोत्रराज" (स्तोत्रों का राजा) के नाम से प्रसिद्ध होगा। जो बुद्धिमान व्यक्ति इसे प्रातःकाल उठकर, त्रिकाल (तीनों संध्याओं में) सदा भक्तियुक्त और विशुद्ध भाव से पढ़ता है, वह पुत्र, धन-वैभव और समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है, तथा अंतकाल में परब्रह्म-स्वरूप को प्राप्त होता है।
इस प्रकार गणेश पुराण के उपासना खंड के तेरहवें अध्याय में वर्णित यह ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर द्वारा रचित गणपतिस्तव सम्पूर्ण होता है।
इस स्तोत्र की अद्वितीय दार्शनिक विशेषता
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह गणेश जी को एक-एक करके सभी प्रमुख देवताओं और तत्त्वों के मूल स्वरूप के रूप में प्रस्तुत करता है:
- ब्रह्मा-स्वरूप (रजोगुण से सृष्टि-कर्ता)
- विष्णु-स्वरूप (सत्त्वगुण से पालनकर्ता)
- शिव-स्वरूप (तमोगुण से संहारकर्ता)
- सूर्य-स्वरूप (ज्ञान और तेज के स्रोत)
- चंद्र-स्वरूप (शीतलता और अमृत के स्रोत)
- शक्ति-स्वरूप (सभी क्रियाओं का मूल)
- प्रकृति और विश्व-स्वरूप (सम्पूर्ण दृश्य-अदृश्य जगत)
यह क्रमिक वर्णन गणेश जी को केवल एक देवता तक सीमित न रखकर उन्हें त्रिदेव सहित समस्त देवताओं और पंचतत्त्वों के मूल कारण के रूप में स्थापित करता है — ठीक वैसे ही जैसे गणपति अथर्वशीर्ष में भी उन्हें "त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रः" कहा गया है। यह समानता दर्शाती है कि गणपत्य दर्शन में गणेश को सदैव सर्वोच्च, सर्वव्यापी ब्रह्म के रूप में ही देखा गया है।
गणपतिस्तवः पाठ की सही विधि
- समय: फलश्रुति में स्पष्ट निर्देश है — "प्रातरुत्थाय...त्रिसन्ध्यं" अर्थात प्रातःकाल उठकर तथा तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में इसका पाठ करना चाहिए।
- भाव: त्रिदेव की विनम्रता और शरणागति का स्मरण करते हुए, विशुद्ध भाव और भक्तियुक्त हृदय से पाठ करें।
- नियमितता: चूंकि यह स्तोत्रराज है और दीर्घ है, इसे धैर्यपूर्वक और नियमित रूप से पढ़ने पर ही फलश्रुति में वर्णित समस्त लाभ प्राप्त होते हैं।
- ध्यान सहित: प्रत्येक श्लोक में वर्णित गणेश जी के विभिन्न स्वरूपों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चंद्र आदि) का मानसिक ध्यान करते हुए पाठ करने से इसका गहरा आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।
यह स्तोत्र किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है
- सर्वांगीण सिद्धि हेतु: फलश्रुति के अनुसार यह पुत्र, धन-वैभव और समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाला स्तोत्र है।
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष हेतु: "अंतकाले परब्रह्मरूपो भवेत्" के अनुसार यह अंतिम समय में परब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
- गहन ध्यान-साधना हेतु: जो साधक गणेश जी के विराट, सर्वव्यापी स्वरूप का ध्यान करना चाहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र एक सम्पूर्ण ध्यान-सूत्र प्रस्तुत करता है।
- विघ्न-मुक्ति हेतु: "मनः स्थापयेदङ्घ्रियुग्मे...न पीडां लभेत" के अनुसार गणेश-चरणों में मन स्थिर करने वाला विघ्नों से पूर्णतः सुरक्षित रहता है।
जब स्वयं विधिवत पाठ करना संभव न हो
चूंकि यह स्तोत्रराज दीर्घ और दार्शनिक रूप से गहन है, इसलिए इसका सही उच्चारण और भाव-बोध अनुभवी मार्गदर्शन में सीखना अधिक लाभकारी है।
यदि आप सर्वांगीण सिद्धि, आध्यात्मिक उन्नति या दीर्घकालिक विघ्न-मुक्ति की कामना रखते हैं, तो 20 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाले ज्योतिषी प्रशांत दैवज्ञ से जुड़कर ऑनलाइन गणपति अनुष्ठान (लाइव वीडियो के माध्यम से) करवा सकते हैं। साथ ही, अपनी कुंडली में भाग्य भाव और मोक्ष-कारक ग्रहों की स्थिति जानने के लिए मात्र ₹251 में उपलब्ध 35-पृष्ठ की विस्तृत ऑनलाइन जन्मकुंडली रिपोर्ट सहायक सिद्ध होगी।
निष्कर्ष
गणपतिस्तवः इस बात का प्रमाण है कि गणेश जी की सर्वोच्चता केवल गणपत्य भक्तों तक सीमित नहीं, बल्कि स्वयं त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — द्वारा भी स्वीकार की गई है। स्वयं गणेश जी द्वारा "स्तोत्रराज" की उपाधि प्राप्त यह स्तोत्र गणेश जी को सृष्टि के समस्त देवताओं, तत्त्वों और शक्तियों के मूल स्रोत के रूप में स्थापित करता है। जो साधक श्रद्धापूर्वक त्रिकाल इसका पाठ करता है, वह न केवल भौतिक सुख-समृद्धि, बल्कि अंततः परब्रह्म-प्राप्ति भी प्राप्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: क्या यह स्तोत्र अकेले ब्रह्मा जी द्वारा रचित है? नहीं, यह स्तोत्र वास्तव में ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर — तीनों देवताओं द्वारा संयुक्त रूप से रचित है, जिसे ब्रह्मा जी ने वर्णित किया है ("ब्रह्मोवाच")। यह गणेश पुराण के उपासना खंड के 13वें अध्याय में वर्णित है।
प्रश्न 2: इस स्तोत्र को "स्तोत्रराज" की उपाधि किसने दी? इस स्तुति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान गणेश ने इसे "स्तोत्रराज" अर्थात स्तोत्रों का राजा घोषित किया। यह गणेश जी द्वारा स्वयं किसी स्तोत्र को दी गई अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट उपाधि है।
प्रश्न 3: इस स्तोत्र में गणेश जी को किन-किन रूपों में वर्णित किया गया है? इस स्तोत्र में गणेश जी को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चंद्र, शक्ति और सम्पूर्ण विश्व के मूल स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है, जो उन्हें समस्त देवताओं और तत्त्वों के परब्रह्म-स्वरूप के रूप में स्थापित करता है।
प्रश्न 4: इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ मिलते हैं? फलश्रुति के अनुसार त्रिकाल श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने वाला पुत्र, धन-वैभव और समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है, तथा अंतकाल में परब्रह्म-स्वरूप को प्राप्त होकर मोक्ष पाता है।
प्रश्न 5: इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए? फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि इसे प्रातःकाल उठकर तथा त्रिसंध्या यानी प्रातः, मध्याह्न और सायं — तीनों समय भक्तियुक्त और विशुद्ध भाव से पढ़ना चाहिए, ताकि इसका पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।
लेखक: Admin
श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती
प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026
स्थिति: प्रकाशित
