
श्री गणेश अष्टोत्तरशतनामावली: 108 नामों में समाया हुआ गणपति का सम्पूर्ण स्वरूप
श्री गणेश अष्टोत्तरशतनामावली (108 नाम) का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हर नाम का विस्तृत हिंदी अर्थ, पाठ विधि और महत्व जानें। सर्वसिद्धि प्रदान करने वाली यह नामावली सम्पूर्ण जीवन का मार्गदर्शक है।
Shri Ganesh Ashtottarashata Namavali: Ganapati's Complete Form in 108 Names
संख्या 108 का रहस्य और इसका आध्यात्मिक महत्व
सनातन परंपरा में संख्या "108" को अत्यंत पवित्र और पूर्णता का प्रतीक माना गया है — यही कारण है कि जप-माला में भी 108 मनके होते हैं। जब यह संख्या किसी देवता के नामों से जुड़ती है, तो वह नामावली उस देवता के सम्पूर्ण स्वरूप — उनके रूप, गुण, शक्ति, लीला और कृपा — को समग्रता से समाहित कर देती है। श्री गणेश अष्टोत्तरशतनामावली ठीक ऐसी ही एक सम्पूर्ण और शक्तिशाली रचना है, जिसमें गणपति के 108 नामों के माध्यम से उनकी सम्पूर्ण महिमा का वर्णन किया गया है।
यह नामावली गणेश सहस्रनाम (1000 नाम) जितनी विशाल तो नहीं, परंतु इतनी सम्पूर्ण अवश्य है कि नित्य पूजा, अभिषेक और विशेष अनुष्ठानों में इसका प्रयोग अत्यंत लोकप्रिय है। प्रत्येक नाम के साथ "नमः" जोड़कर इसका जप करने से एक-एक करके गणेश जी के 108 स्वरूपों का ध्यान होता है, जो साधक के मन को पूर्ण एकाग्रता और भक्ति में स्थिर कर देता है।
अष्टोत्तरशतनामावली की संरचना
इस नामावली की विशेषता यह है कि इसे दस-दस नामों के समूहों में बांटा गया है, जो पाठ करते समय गिनती बनाए रखने में सहायक होता है — ठीक वैसे ही जैसे माला में मनकों की गिनती की जाती है। आइए अब सम्पूर्ण नामावली को उसके मूल संस्कृत रूप और प्रत्येक नाम के विस्तृत हिंदी अर्थ के साथ समझते हैं।
श्री गणेश अष्टोत्तरशतनामावली — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ
ॐ विघ्नेशाय । विश्ववरदाय । विश्वचक्षुषे । जगत्प्रभवे । हिरण्यरूपाय ।
सर्वात्मने । ज्ञानरूपाय । जगन्मयाय । ऊध्वरेतसे । महाबाहवे नमः ॥ १०॥
ॐ अमेयाय । अमितविक्रमाय । वेदवेद्याय । महाकालाय । विद्यानिधये ।
अनामयाय । सर्वज्ञाय । सर्वगाय । शान्ताय । गजास्याय नमः ॥ २०॥
ॐ चित्तेश्वराय । विगतज्वराय । विश्वमूर्तये । अमेयात्मने । विश्वाधाराय ।
सनातनाय । सामगानप्रियाय । मन्त्रिणे । सत्त्वाधाराय । सुराधीशाय नमः ॥ ३०॥
ॐ समस्तसाक्षिणे । निर्द्वन्द्वाय । निर्लिप्ताय । अमोघविक्रमाय । निर्मलाय ।
पुण्याय । कामदाय । कान्तिदाय । कामरूपिणे । कामपोषिणे नमः ॥ ४०॥
ॐ कमलाक्षाय । गजाननाय । सुमुखाय । शर्मदाय । मूषकाधिपवाहनाय ।
शुद्धाय । दीर्घतुण्डाय । श्रीपतये । अनन्ताय । मोहवर्जिताय नमः ॥ ५०॥
ॐ वक्रतुण्डाय । शूर्पकर्णाय । पावनाय । योगीशाय । योगिवन्द्याङ्घ्रये ।
उमासुताय । अघापहाय । एकदन्ताय । महाग्रीवाय । सिद्धिसेविताय नमः ॥ ६०॥
ॐ सिद्धिदाय । करुणाय । सिद्धाय । भगवते । भव्यविग्रहाय । विकटाय ।
कपिलाय । ढुण्ढिराजाय । उग्राय । भीमाय नमः ॥ ७०॥
ॐ शुभाय । गणाध्यक्षाय । गणेशाय । गणाराध्याय । गणनायकाय ।
ज्योतिःस्वरूपाय । भूतात्मने । धूम्रकेतवे । अनुकूलाय । कुमारगुरवे नमः ॥ ८०॥
ॐ आनन्दाय । हेरम्बाय । वेदस्तुताय । नागयज्ञोपवीतिने । दुर्धर्षाय ।
बालदूर्वाङ्कुरप्रियाय । भालचन्द्राय । विश्वधाम्ने । शिवपुत्राय । विनायकाय नमः ॥ ९०॥
ॐ लीलावलम्बितवपुषे । पूर्णाय । परमसुन्दराय । विघ्नान्धकारमार्ताण्डाय ।
सिन्दूरवदनाय । नित्याय । विभवे । विष्णुप्रथमपूजिताय ।
शरण्यदिव्यपादाब्जाय । भक्तमन्दारभूरुहाय नमः ॥ १००॥
ॐ महाशूराय । रत्नसिंहासनासीनाय । मणिकुण्डलमण्डिताय ।
भक्तकल्याणदाय । अमेयाय । अमेयकल्याणगुणसंश्रयाय । सहस्रशीर्ष्णे ।
महागणपतये नमः ॥ १०८॥
इति गणेशाष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ।
प्रत्येक नाम का विस्तृत हिंदी अर्थ
प्रथम दशक (नाम 1-10) — सर्वोच्चता और सर्वव्यापकता
- विघ्नेश — विघ्नों के स्वामी
- विश्ववरद — सम्पूर्ण विश्व को वरदान देने वाले
- विश्वचक्षु — विश्व की आंख अर्थात सर्वद्रष्टा
- जगत्प्रभव — जगत की उत्पत्ति के कारण
- हिरण्यरूप — स्वर्ण के समान कांति वाले
- सर्वात्मा — सबकी आत्मा में स्थित
- ज्ञानरूप — ज्ञान-स्वरूप
- जगन्मय — जगत में व्याप्त
- ऊर्ध्वरेतस् — ब्रह्मचर्य-स्वरूप, ऊर्ध्वगामी शक्ति वाले
- महाबाहु — विशाल भुजाओं वाले
द्वितीय दशक (नाम 11-20) — ज्ञान और असीम शक्ति
- अमेय — जिनकी माप न की जा सके
- अमितविक्रम — असीम पराक्रम वाले
- वेदवेद्य — वेदों द्वारा जानने योग्य
- महाकाल — महाकाल-स्वरूप
- विद्यानिधि — विद्या के भंडार
- अनामय — रोग-रहित
- सर्वज्ञ — सब कुछ जानने वाले
- सर्वग — सर्वव्यापी
- शान्त — शांत स्वभाव वाले
- गजास्य — हाथी के मुख वाले
तृतीय दशक (नाम 21-30) — नित्यता और देव-प्रियता
- चित्तेश्वर — मन के स्वामी
- विगतज्वर — संताप-रहित
- विश्वमूर्ति — विश्व-स्वरूप
- अमेयात्मा — असीम आत्मा वाले
- विश्वाधार — विश्व के आधार
- सनातन — नित्य, शाश्वत
- सामगानप्रिय — सामवेद के गायन से प्रसन्न होने वाले
- मन्त्रिन् — मंत्र-स्वरूप
- सत्त्वाधार — सत्त्वगुण के आधार
- सुराधीश — देवताओं के स्वामी
चतुर्थ दशक (नाम 31-40) — पवित्रता और कामना-पूर्ति
- समस्तसाक्षी — सबके साक्षी
- निर्द्वन्द्व — द्वंद्व-रहित
- निर्लिप्त — निर्लिप्त, अनासक्त
- अमोघविक्रम — अचूक पराक्रम वाले
- निर्मल — निर्मल, शुद्ध
- पुण्य — पुण्य-स्वरूप
- कामद — कामनाएं पूर्ण करने वाले
- कान्तिद — कांति (तेज) प्रदान करने वाले
- कामरूपी — इच्छानुसार रूप धारण करने वाले
- कामपोषी — कामनाओं का पोषण करने वाले
पंचम दशक (नाम 41-50) — रूप-सौंदर्य और वाहन
- कमलाक्ष — कमल के समान नेत्रों वाले
- गजानन — हाथी के मुख वाले
- सुमुख — सुंदर मुख वाले
- शर्मद — सुख देने वाले
- मूषकाधिपवाहन — मूषक-राज को वाहन बनाने वाले
- शुद्ध — शुद्ध स्वरूप
- दीर्घतुण्ड — लंबी सूंड वाले
- श्रीपति — श्री (लक्ष्मी) के स्वामी
- अनन्त — अनंत, असीम
- मोहवर्जित — मोह से रहित
षष्ठ दशक (नाम 51-60) — योग और सिद्धि-सेवा
- वक्रतुण्ड — टेढ़ी सूंड वाले
- शूर्पकर्ण — सूप के समान कानों वाले
- पावन — पवित्र करने वाले
- योगीश — योगियों के स्वामी
- योगिवन्द्याङ्घ्रि — योगियों द्वारा वंदित चरणों वाले
- उमासुत — उमा (पार्वती) के पुत्र
- अघापह — पापों का नाश करने वाले
- एकदन्त — एक दांत वाले
- महाग्रीव — विशाल ग्रीवा वाले
- सिद्धिसेवित — सिद्धियों द्वारा सेवित
सप्तम दशक (नाम 61-70) — करुणा और उग्र शक्ति
- सिद्धिद — सिद्धि प्रदान करने वाले
- करुण — करुणामय
- सिद्ध — सिद्ध-स्वरूप
- भगवत् — भगवान-स्वरूप
- भव्यविग्रह — भव्य शरीर वाले
- विकट — विशाल शरीर वाले
- कपिल — कपिल वर्ण वाले
- ढुण्ढिराज — ढुण्ढि नामक राजा (काशी में प्रसिद्ध स्वरूप)
- उग्र — उग्र, तेजस्वी
- भीम — भीम, विशाल
अष्टम दशक (नाम 71-80) — नेतृत्व और ज्योति-स्वरूप
- शुभ — शुभ स्वरूप
- गणाध्यक्ष — गणों के अध्यक्ष
- गणेश — गणों के स्वामी
- गणाराध्य — गणों द्वारा आराधित
- गणनायक — गणों के नायक
- ज्योतिःस्वरूप — प्रकाश-स्वरूप
- भूतात्मा — भूतों की आत्मा
- धूम्रकेतु — धूम्र वर्ण की ध्वजा वाले
- अनुकूल — अनुकूल, हितकारी
- कुमारगुरु — कुमार (कार्तिकेय) के भी गुरु
नवम दशक (नाम 81-90) — आनंद और शिव-संबंध
- आनन्द — आनंद-स्वरूप
- हेरम्ब — दीनों के रक्षक
- वेदस्तुत — वेदों द्वारा स्तुत
- नागयज्ञोपवीतिन् — सर्प का यज्ञोपवीत धारण करने वाले
- दुर्धर्ष — जिन पर आक्रमण न किया जा सके
- बालदूर्वाङ्कुरप्रिय — कोमल दूर्वा-अंकुर प्रिय
- भालचन्द्र — मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले
- विश्वधाम — विश्व के निवास-स्थान
- शिवपुत्र — शिव-पुत्र
- विनायक — विनायक, विशेष नायक
दशम दशक (नाम 91-100) — पूर्णता और भक्त-वात्सल्य
- लीलावलम्बितवपु — लीलामय शरीर धारण करने वाले
- पूर्ण — पूर्ण, सम्पूर्ण
- परमसुन्दर — परम सुंदर
- विघ्नान्धकारमार्ताण्ड — विघ्न-रूपी अंधकार के लिए सूर्य-स्वरूप
- सिन्दूरवदन — सिंदूर वर्ण के मुख वाले
- नित्य — नित्य, शाश्वत
- विभु — सर्वव्यापी प्रभु
- विष्णुप्रथमपूजित — विष्णु द्वारा सर्वप्रथम पूजित
- शरण्यदिव्यपादाब्ज — शरणागतों के लिए दिव्य चरण-कमल वाले
- भक्तमन्दारभूरुह — भक्तों के लिए कल्पवृक्ष स्वरूप
एकादश दशक (नाम 101-108) — ऐश्वर्य और महागणपति-स्वरूप
- महाशूर — महान वीर
- रत्नसिंहासनासीन — रत्न-जड़ित सिंहासन पर विराजमान
- मणिकुण्डलमण्डित — मणि-कुंडलों से सुशोभित
- भक्तकल्याणद — भक्तों का कल्याण करने वाले
- अमेय — असीम, अतुलनीय
- अमेयकल्याणगुणसंश्रय — असीम कल्याणकारी गुणों के आश्रय
- सहस्रशीर्षा — सहस्र-मस्तक वाले (विराट स्वरूप)
- महागणपति — समस्त गणों के महान अधिपति
इस प्रकार यह श्री गणेश अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्ण होती है।
इस नामावली में छिपा भावनात्मक और आध्यात्मिक प्रवाह
यदि हम इन 108 नामों को समूह में देखें, तो एक सुंदर क्रम दिखाई देता है — आरंभ में गणेश जी की सर्वोच्चता और सर्वव्यापकता (विघ्नेश, विश्वप्रभव), फिर उनकी ज्ञान-शक्ति (सर्वज्ञ, वेदवेद्य), इसके बाद उनकी नित्यता और शांत स्वभाव, फिर उनका सुंदर रूप-वर्णन (गजानन, कमलाक्ष), तत्पश्चात योग और सिद्धि से संबंध, फिर उनकी करुणा और भक्त-वात्सल्यता, और अंत में उनका ऐश्वर्यशाली "महागणपति" स्वरूप — यह संरचना दर्शाती है कि यह नामावली केवल नामों की सूची नहीं, बल्कि गणेश-तत्व की एक सुव्यवस्थित, क्रमिक यात्रा है।
अष्टोत्तरशतनामावली पाठ की सही विधि
- समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात, विशेषकर बुधवार और गणेश चतुर्थी के दिन इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- अर्चना विधि: पारंपरिक रूप से इस नामावली का उपयोग "नामार्चन" के लिए किया जाता है — अर्थात प्रत्येक नाम बोलते हुए गणेश प्रतिमा पर एक-एक दूर्वा, अक्षत या पुष्प अर्पित किया जाता है।
- जप विधि: यदि पुष्पार्चन संभव न हो, तो केवल जप के रूप में भी इसका पाठ किया जा सकता है, प्रत्येक नाम के साथ "नमः" जोड़ते हुए।
- 108 की संख्या का महत्व: चूंकि यह ठीक 108 नामों की है, इसे माला के 108 मनकों के साथ भी जपा जा सकता है, जो एक पूर्ण माला के बराबर होता है।
- विशेष अवसर: गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, या किसी विशेष अभिषेक-पूजा के समय इस नामावली का पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
यह नामावली किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है
- सम्पूर्ण अभिषेक-पूजा हेतु: नामार्चन के लिए यह सबसे उपयुक्त नामावली मानी जाती है, क्योंकि इसकी संख्या पूजा में उपयुक्त समय और भाव दोनों प्रदान करती है।
- एकाग्रता और ध्यान हेतु: 108 अलग-अलग नामों का क्रमवार जप मन को गहन एकाग्रता में ले जाता है।
- सर्वांगीण कृपा हेतु: चूंकि यह नामावली गणेश जी के ज्ञान, शक्ति, करुणा, सौंदर्य और ऐश्वर्य — सभी पहलुओं को समेटती है, इसलिए यह जीवन के हर क्षेत्र में कृपा प्राप्त करने के लिए उपयुक्त है।
- विशेष उत्सवों में: गणेश चतुर्थी के 10 दिवसीय उत्सव में प्रतिदिन इसका पाठ विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
जब विधिवत नामार्चन स्वयं करना संभव न हो
यदि आप स्वयं समय के अभाव में या सही विधि न जानने के कारण यह अभिषेक-पूजा नहीं कर पा रहे, तो अनुभवी आचार्य से विधिवत नामार्चन करवाना एक उत्तम विकल्प है।
20 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाले ज्योतिषी प्रशांत दैवज्ञ से जुड़कर आप ऑनलाइन गणपति अभिषेक व नामार्चन अनुष्ठान (लाइव वीडियो के माध्यम से) करवा सकते हैं। साथ ही, अपनी कुंडली में गणेश-कारक बुध ग्रह की स्थिति जानने के लिए मात्र ₹251 में उपलब्ध 35-पृष्ठ की विस्तृत ऑनलाइन जन्मकुंडली रिपोर्ट सहायक सिद्ध होगी।
निष्कर्ष
श्री गणेश अष्टोत्तरशतनामावली गणपति के 108 दिव्य स्वरूपों का ऐसा संग्रह है, जो साधक को उनके विघ्नहर्ता, ज्ञानदाता, करुणामय और ऐश्वर्यशाली — सभी रूपों से एक साथ जोड़ता है। यह नामावली केवल एक पूजा-सामग्री नहीं, बल्कि गणेश-तत्व की गहन समझ प्रदान करने वाला एक सम्पूर्ण आध्यात्मिक मार्गदर्शक है। नियमित श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका पाठ करने वाला साधक निश्चय ही जीवन के हर क्षेत्र में गणपति की पूर्ण कृपा प्राप्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: गणेश अष्टोत्तरशतनामावली में कुल कितने नाम हैं और इसकी संरचना कैसी है? इस नामावली में गणेश जी के कुल 108 नाम हैं, जिन्हें परंपरागत रूप से दस-दस नामों के 10 समूहों (दशकों) में बांटा गया है, ताकि पाठ करते समय गिनती बनाए रखना आसान हो और नामार्चन में सुविधा हो।
प्रश्न 2: इस नामावली का पाठ कैसे करना चाहिए? पारंपरिक विधि में प्रत्येक नाम के साथ "नमः" जोड़कर गणेश प्रतिमा पर एक-एक दूर्वा, अक्षत या पुष्प अर्पित किया जाता है, जिसे "नामार्चन" कहते हैं। यदि यह संभव न हो, तो केवल जप के रूप में भी इसका पाठ किया जा सकता है।
प्रश्न 3: इस नामावली के पाठ से क्या लाभ मिलते हैं? यह नामावली गणेश जी के ज्ञान, शक्ति, करुणा, सौंदर्य और ऐश्वर्य — सभी पहलुओं को समेटती है, इसलिए इसका नियमित पाठ सर्वांगीण कृपा, एकाग्रता, विघ्न-नाश और जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्रदान करने वाला माना जाता है।
प्रश्न 4: इस नामावली का पाठ कब करना उत्तम है? प्रातःकाल स्नान के पश्चात, विशेषकर बुधवार, गणेश चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी के दिन इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है। गणेश चतुर्थी के दस दिवसीय उत्सव में प्रतिदिन इसका पाठ विशेष पुण्यदायी है।
प्रश्न 5: क्या इसे माला के साथ भी जपा जा सकता है? हां, चूंकि इस नामावली में ठीक 108 नाम हैं, जो एक पूर्ण जप-माला के मनकों की संख्या के बराबर है, इसलिए इसे माला के साथ जपने पर एक सम्पूर्ण माला जप का भाव और फल प्राप्त होता है।
अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।
लेखक: Admin
श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती
प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026
स्थिति: प्रकाशित
