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गणेश भुजंगम्: आदि शंकराचार्य की वह काव्य-कृति जिसकी लय सर्प की गति जैसी बहती है

गणेश भुजंगम्: आदि शंकराचार्य की वह काव्य-कृति जिसकी लय सर्प की गति जैसी बहती है

आदि शंकराचार्य रचित श्रीगणेशभुजङ्गम् (गणेश भुजंग प्रयात स्तोत्र) का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और महत्व जानें। सर्प की लहर जैसी लयबद्ध इस रचना से पाएं वाणी की सिद्धि।

Ganesha Bhujangam: Adi Shankaracharya's Verse That Flows Like a Serpent's Glide

"भुजंग" छंद — जब काव्य स्वयं नृत्य करने लगे

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित स्तोत्रों में भुजंगम् या भुजंगप्रयात शैली की रचनाएं अपनी विशिष्ट लयात्मकता के लिए प्रसिद्ध हैं। "भुजंग" का अर्थ है सर्प, और "प्रयात" का अर्थ है गति — अर्थात यह छंद सर्प की लहरदार, बहती हुई गति के समान लयबद्ध होता है। इसी शैली में रचित श्रीगणेशभुजङ्गम् (जिसे गणेश भुजंगप्रयात स्तोत्र भी कहा जाता है) गणेश जी को समर्पित एक अत्यंत सुंदर और संगीतमय स्तवन है।

यह स्तोत्र नौ श्लोकों में गणेश जी के नृत्यरत, आभूषण-सुशोभित, दिव्य स्वरूप का इतना सजीव वर्णन करता है कि पढ़ते समय मानो गणेश जी स्वयं तांडव करते हुए आंखों के सामने साकार हो उठते हैं — और अंत में यह उन्हें साक्षात ओंकार, परब्रह्म और वेदों के गर्भ-स्वरूप घोषित करता है।

श्रीगणेशभुजङ्गम् — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

रणत्क्षुद्रघण्टानिनादाभिरामं

चलत्ताण्डवोद्दण्डवत्पद्मतालम् ।

लसत्तुन्दिलाङ्गोपरिव्यालहारं

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ १॥


ध्वनिध्वंसवीणालयोल्लासिवक्त्रं

स्फुरच्छुण्डदण्डोल्लसद्बीजपूरम् ।

गलद्दर्पसौगन्ध्यलोलालिमालं

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ २॥


प्रकाशज्जपारक्तरत्नप्रसून-

प्रवालप्रभातारुणज्योतिरेकम् ।

प्रलम्बोदरं वक्रतुण्डैकदन्तं

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ ३॥


विचित्रस्फुरद्रत्नमालाकिरीटं

किरीटोल्लसच्चन्द्ररेखाविभूषम् ।

विभूषैकभूशं भवध्वंसहेतुं

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ ४॥


उदञ्चद्भुजावल्लरीदृश्यमूलो-

च्चलद्भ्रूलताविभ्रमभ्राजदक्षम् ।

मरुत्सुन्दरीचामरैः सेव्यमानं

गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ ५॥


स्फुरन्निष्ठुरालोलपिङ्गाक्षितारं

कृपाकोमलोदारलीलावतारम् ।

कलाबिन्दुगं गीयते योगिवर्यै-

र्गणाधीशमीशानसूनुं तमीडे ॥ ६॥


यमेकाक्षरं निर्मलं निर्विकल्पं

गुणातीतमानन्दमाकारशून्यम् ।

परं पारमोङ्कारमाम्नायगर्भं

वदन्ति प्रगल्भं पुराणं तमीडे ॥ ७॥


चिदानन्दसान्द्राय शान्ताय तुभ्यं

नमो विश्वकर्त्रे च हर्त्रे च तुभ्यम् ।

नमोऽनन्तलीलाय कैवल्यभासे

नमो विश्वबीज प्रसीदेशसूनो ॥ ८॥


इमं सुस्तवं प्रातरुत्थाय भक्त्या

पठेद्यस्तु मर्त्यो लभेत्सर्वकामान् ।

गणेशप्रसादेन सिध्यन्ति वाचो

गणेशे विभौ दुर्लभं किं प्रसन्ने ॥ ९॥


इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं गणेशभुजङ्गप्रयातस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

हिंदी अर्थ:

श्लोक १: क्षुद्र घंटियों की मनोहर झंकार से सुशोभित, तांडव नृत्य करते समय कमल-चरणों से ताल देने वाले, जिनके स्थूल शरीर पर सर्प-हार सुशोभित है — उन ईशान (शिव) के पुत्र, गणों के स्वामी की मैं स्तुति करता हूं।

श्लोक २: जिनका मुख वीणा की ध्वनि को भी मात देने वाले मधुर स्वर से उल्लसित रहता है, जिनकी सूंड में बिजौरा नींबू चमकता है, जिनके कपोलों से झरते मद की सुगंध से भ्रमरों की माला मंडराती रहती है — उन ईशान-पुत्र गणाधीश की मैं स्तुति करता हूं।

श्लोक ३: जो जपा पुष्प, लाल रत्न, प्रवाल और प्रातःकालीन अरुण ज्योति के समान अद्वितीय प्रकाश से युक्त हैं, जिनका उदर विशाल है, जिनकी सूंड टेढ़ी और एक दांत है — उन ईशान-पुत्र गणाधीश की मैं स्तुति करता हूं।

श्लोक ४: जिनका मुकुट विचित्र चमकते रत्नों की माला से सुशोभित है, जिनके मुकुट पर चंद्रमा की रेखा शोभायमान है, जो समस्त आभूषणों के मूल आधार हैं, जो संसार-नाश के कारण हैं — उन ईशान-पुत्र गणाधीश की मैं स्तुति करता हूं।

श्लोक ५: जिनकी उठी हुई लता के समान सुंदर भुजाओं के मूल में चंचल भौं-लताओं की विभ्रम-क्रीड़ा दिखाई देती है, जिनकी सेवा वायु की सुंदरियां चंवर डुलाकर करती हैं — उन ईशान-पुत्र गणाधीश की मैं स्तुति करता हूं।

श्लोक ६: जिनकी चमकती, तीक्ष्ण, चंचल पिंगल नेत्र-तारा हैं, जिनकी लीला कृपा से कोमल और उदार अवतार-स्वरूप है, जिन्हें योगीश्रेष्ठ कला-बिंदु के रूप में गाते हैं — उन ईशान-पुत्र गणाधीश की मैं स्तुति करता हूं।

श्लोक ७: जिन्हें एकाक्षर (ॐ), निर्मल, निर्विकल्प, गुणातीत, आनंद-स्वरूप, आकार-रहित, परम, पार, ओंकार-स्वरूप, वेदों का गर्भ और प्रगल्भ (प्रौढ़) पुराण-पुरुष कहा जाता है, उन्हें मैं नमन करता हूं।

श्लोक ८: हे चिदानंद-घन! हे शांत-स्वरूप! आपको नमस्कार है। हे विश्व के कर्ता और हर्ता! आपको नमस्कार है। हे अनंत लीला वाले! हे कैवल्य के प्रकाश! हे विश्व के बीज-स्वरूप! हे ईश-पुत्र! प्रसन्न होइए।

श्लोक ९ (फलश्रुति): जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक इस सुंदर स्तवन का पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है। गणेश जी की कृपा से वाणी सिद्ध हो जाती है — जब सर्वव्यापी गणेश प्रसन्न हों, तो क्या ही दुर्लभ रह जाता है?

इस प्रकार श्रीमद् शंकराचार्य द्वारा रचित यह गणेश भुजंगप्रयात स्तोत्र सम्पूर्ण होता है।

भुजंगप्रयात छंद की विशेषता और इसका सौंदर्य-शास्त्रीय महत्व

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका छंद है। "भुजंगप्रयात" एक ऐसा छंद है जिसमें प्रत्येक पद में लघु-गुरु-गुरु की चार बार आवृत्ति होती है, जिससे एक विशेष लहरदार, बहती हुई लय उत्पन्न होती है — बिल्कुल वैसे ही जैसे सर्प भूमि पर बहते हुए चलता है। यही कारण है कि आदि शंकराचार्य ने इस छंद का प्रयोग विशेष रूप से नृत्यरत देवताओं (जैसे नटराज-स्वरूप शिव, तांडव करते गणेश) की स्तुति के लिए किया, क्योंकि छंद की गति स्वयं उस नृत्य-भाव को प्रतिबिंबित करती है।

पहले ही श्लोक में "चलत्ताण्डवोद्दण्डवत्पद्मतालम्" कहकर गणेश जी को तांडव-नृत्य करते हुए वर्णित किया गया है — यह गणेश जी के उस स्वरूप को उजागर करता है जो सामान्यतः कम चर्चित है, क्योंकि प्रायः शिव को ही तांडव-नर्तक के रूप में जाना जाता है, परंतु यह स्तोत्र गणेश जी को भी इस दिव्य नृत्य-कला का स्वामी बताता है।

स्थूल से सूक्ष्म तक की यात्रा — इस स्तोत्र की आंतरिक संरचना

यह स्तोत्र भी गणेश पंचरत्न स्तोत्र की भांति एक सुंदर क्रमिक यात्रा प्रस्तुत करता है:

  • श्लोक 1-6 (स्थूल रूप-वर्णन): इनमें गणेश जी के शारीरिक सौंदर्य, आभूषण, नृत्य, संगीत और दिव्य लीला का अत्यंत काव्यात्मक वर्णन है।
  • श्लोक 7 (सूक्ष्म-तात्त्विक स्वरूप): यहां अचानक शैली बदल जाती है, और गणेश जी को एकाक्षर ओंकार, निर्गुण, निराकार परब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
  • श्लोक 8 (समर्पण): यहां भक्त पूर्ण समर्पण के भाव से गणेश जी को सृष्टि-कर्ता-हर्ता और कैवल्य (मोक्ष) के प्रकाश के रूप में नमन करता है।
  • श्लोक 9 (फलश्रुति): अंत में वाणी-सिद्धि और सर्वकामना-पूर्ति का वरदान दिया गया है।

यह संरचना अद्वैत वेदांत की उस मूल शिक्षा को प्रतिबिंबित करती है कि साकार भक्ति अंततः निराकार ब्रह्म-ज्ञान की ओर ले जाती है।

गणेश भुजंगम् पाठ की सही विधि

  1. समय: स्वयं फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है — "प्रातरुत्थाय" अर्थात प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करना चाहिए।
  2. लय के साथ: चूंकि यह भुजंगप्रयात छंद में रचित है, इसे लयबद्ध ढंग से, स्वर के उतार-चढ़ाव के साथ गाने पर इसका पूर्ण सौंदर्य और प्रभाव अनुभव होता है।
  3. भाव: प्रत्येक श्लोक में गणेश जी के नृत्यरत, आभूषण-सुशोभित रूप का ध्यान करते हुए भक्तिभाव से पाठ करें।
  4. वाणी-सिद्धि हेतु: विद्यार्थी, वक्ता, लेखक और गायक — जो भी वाणी और अभिव्यक्ति से जुड़े क्षेत्र में हैं, उनके लिए यह स्तोत्र विशेष उपयुक्त है।

यह स्तोत्र किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है

  • वाणी और अभिव्यक्ति-सिद्धि हेतु: फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है — "गणेशप्रसादेन सिध्यन्ति वाचः" अर्थात गणेश-कृपा से वाणी सिद्ध होती है, इसलिए यह वक्ताओं, शिक्षकों और लेखकों के लिए विशेष उपयुक्त है।
  • सर्वकामना-पूर्ति हेतु: "लभेत्सर्वकामान्" के अनुसार यह समस्त इच्छाओं की पूर्ति में सहायक है।
  • संगीत और कला-साधकों हेतु: इसकी लयात्मक संरचना और नृत्य-संगीत से संबंधित वर्णन इसे कलाकारों के लिए विशेष प्रिय बनाता है।
  • साकार से निराकार भक्ति की यात्रा हेतु: जो साधक मूर्ति-पूजा से आगे बढ़कर निर्गुण ब्रह्म-ज्ञान की ओर जाना चाहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र एक सुंदर सेतु का कार्य करता है।

जब स्वयं विधिवत पाठ करना संभव न हो

यदि आप वाणी-सिद्धि, अभिव्यक्ति-क्षमता या किसी विशेष इच्छा-पूर्ति की कामना रखते हैं, तो 20 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाले ज्योतिषी प्रशांत दैवज्ञ से जुड़कर ऑनलाइन गणपति अनुष्ठान (लाइव वीडियो के माध्यम से) करवा सकते हैं। साथ ही, अपनी कुंडली में वाणी-कारक बुध ग्रह की स्थिति जानने के लिए मात्र ₹251 में उपलब्ध 35-पृष्ठ की विस्तृत ऑनलाइन जन्मकुंडली रिपोर्ट सहायक सिद्ध होगी।

निष्कर्ष

श्रीगणेशभुजङ्गम् आदि शंकराचार्य की काव्य-प्रतिभा और आध्यात्मिक गहराई का अद्भुत संगम है। भुजंगप्रयात छंद की लहरदार लय में रचित यह स्तोत्र गणेश जी के नृत्यरत, आभूषण-सुशोभित सौंदर्य से आरंभ होकर, उन्हें साक्षात ओंकार और परब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए समाप्त होता है। जो साधक प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करता है, वह न केवल वाणी की सिद्धि, बल्कि समस्त कामनाओं की पूर्ति भी प्राप्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: "भुजंगम्" या "भुजंगप्रयात" छंद का क्या अर्थ है? "भुजंग" का अर्थ है सर्प, और "प्रयात" का अर्थ है गति। यह एक विशेष संस्कृत छंद है जिसकी लय सर्प की लहरदार, बहती हुई गति के समान होती है, जो आदि शंकराचार्य द्वारा विशेष रूप से नृत्यरत देवताओं की स्तुति के लिए प्रयुक्त की गई है।

प्रश्न 2: गणेश भुजंगम् किसने रचा है? इस स्तोत्र की रचना जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने की है। यह नौ श्लोकों में रचित है, जिसमें आठ श्लोक गणेश जी के रूप-वर्णन और स्तुति में हैं, तथा अंतिम श्लोक फलश्रुति है।

प्रश्न 3: इस स्तोत्र के पाठ से क्या विशेष लाभ मिलता है? फलश्रुति के अनुसार इस स्तोत्र के नियमित पाठ से समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है, और गणेश जी की कृपा से वाणी सिद्ध होती है — अर्थात यह विशेष रूप से वाणी और अभिव्यक्ति की क्षमता बढ़ाने वाला माना जाता है।

प्रश्न 4: इस स्तोत्र की काव्य-संरचना में क्या विशेषता है? यह स्तोत्र स्थूल रूप-वर्णन (नृत्य, आभूषण, सौंदर्य) से आरंभ होकर सूक्ष्म तात्त्विक स्वरूप (ओंकार, निर्गुण ब्रह्म) की ओर बढ़ता है, जो अद्वैत वेदांत की साकार भक्ति से निराकार ज्ञान की यात्रा को दर्शाता है।

प्रश्न 5: इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए? फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है — "प्रातरुत्थाय" अर्थात प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक इसका पाठ करना चाहिए, ताकि इसका पूर्ण फल प्राप्त हो सके।

अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

लेखक: Admin

श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती

प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026

स्थिति: प्रकाशित