Astro Pujatirth logo
← सभी ब्लॉग
गणेश कवचम् (विस्तृत संस्करण): चार युगों के चार स्वरूपों से सिर से पैर तक की सुरक्षा

गणेश कवचम् (विस्तृत संस्करण): चार युगों के चार स्वरूपों से सिर से पैर तक की सुरक्षा

गणेश पुराण में वर्णित मुद्गलकृतं गणेशकवचम् (विस्तृत संस्करण) का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ जानें। चारों युगों के स्वरूप, दिशाओं और कारागार-मुक्ति तक का वर्णन करने वाला यह विस्तृत कवच।

Ganesh Kavacham (Extended Version): Head-to-Foot Protection Through the Four Yugas

भूमिका: महर्षि मुद्गल द्वारा कश्यप को सौंपा गया गुह्य कवच

इससे पहले हमने विश्वसार तंत्र में वर्णित "हरिद्रा गणेश कवच" पर चर्चा की थी, जो 14 श्लोकों का एक संक्षिप्त परंतु प्रभावशाली कवच है। परंतु गणेश पुराण के क्रीड़ाखंड (उत्तरखंड) के 85वें अध्याय में एक अधिक विस्तृत, गहन और व्यापक कवच वर्णित है — मुद्गलकृतं गणेशकवचम्, जिसकी रचना स्वयं महर्षि मुद्गल ने की थी और जिसे उन्होंने कश्यप ऋषि को, तथा कश्यप ने आगे महर्षि माण्डव्य को प्रदान किया।

यह विस्तृत कवच पच्चीस श्लोकों में फैला हुआ है, और इसकी विशेषता यह है कि यह न केवल शरीर के प्रत्येक अंग की, बल्कि आठों दिशाओं, दिन-रात, गुणों (सत्व-रज-तम), स्मृति, धर्म, धन, परिवार, पशुधन — जीवन के हर पहलू की सुरक्षा का विस्तृत वर्णन करता है।

मुद्गलकृतं गणेशकवचम् — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

चार युगों के चार स्वरूपों का ध्यान

मुनिरुवाच ।


ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहुमाद्ये युगे

त्रेतायान्तु मयूरवाहनमिमं षड्बाहुकं सिद्धिदम् ।

द्वापारे तु गजाननं युगभुजं रक्ताङ्गरागं विभुं

तुर्ये तु द्विभुजं सिताङ्गरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥ १८॥

हिंदी अर्थ: मुनि ने कहा — सतयुग में सिंह पर सवार, दिशाओं में फैली भुजाओं वाले विनायक का ध्यान करना चाहिए। त्रेतायुग में मयूर-वाहन, छह भुजाओं वाले, सिद्धिदाता इसी देव का ध्यान करें। द्वापरयुग में गजानन, चार भुजाओं वाले, रक्तवर्ण, सर्वव्यापी प्रभु का ध्यान करें। कलियुग में दो भुजाओं वाले, श्वेतवर्ण, अत्यंत सुंदर, सदा समस्त पदार्थ देने वाले स्वरूप का ध्यान करें।

सिर से पैर तक अंग-रक्षा

विनायकः शिखां पातु परमात्मा परात्परः ।

अतिसुन्दरकायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥ १९॥


ललाटं काश्यपः पातु भ्रूयुगन्तु महोदरः ।

नयने भालचन्द्रस्तु गजास्यत्वोष्ठपल्लवौ ॥ २०॥


जिह्वां पातु गणक्रीडश्चिबुकं गिरिजासुतः ।

वाचं विनायकः पातु दन्तान् रक्षतु दुर्मुखः ॥ २१॥


श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिन्तितार्थदः ।

गणेशस्तु मुखं कण्ठं पातु देवो गणञ्जयः ॥ २२॥


स्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः ।

हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥ २३॥


धराधरः पातु पार्श्वे पृष्ठं विघ्नहरः शुभः ।

लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥ २४॥


गणक्रीडो जानुजङ्घे ऊरुमङ्गलमूर्तिमान् ।

एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ॥ २५॥


क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः ।

अङ्गुलीश्च नखान् पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः ॥ २६॥


सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु ।

अनुक्तमपि यत् स्थानं धूम्रकेतुः सदाऽवतु ॥ २७॥

हिंदी अर्थ: विनायक, परमात्मा, परात्पर मेरी शिखा की रक्षा करें। अत्यंत सुंदर शरीर वाले, महोत्कट मेरे मस्तक की रक्षा करें। काश्यप मेरे ललाट की, महोदर दोनों भौंहों की, भालचंद्र नेत्रों की, गजास्य ओठों की रक्षा करें। गणक्रीड जिह्वा की, गिरिजासुत चिबुक की, विनायक वाणी की, दुर्मुख दांतों की रक्षा करें। पाशपाणि दोनों कानों की, चिंतितार्थद नासिका की, गणेश देव मुख और कंठ की रक्षा करें। गजस्कंध कंधों की, विघ्नविनाशन वक्षस्थल की, गणनाथ हृदय की, महान हेरम्ब उदर की रक्षा करें। धराधर पार्श्व (बगल) की, शुभ विघ्नहर पीठ की, महाबली वक्रतुण्ड गुह्य अंगों की सदा रक्षा करें। गणक्रीड घुटनों-पिंडलियों की, मंगलमूर्ति जांघों की, महाबुद्धि एकदंत पैरों-टखनों की सदा रक्षा करें। क्षिप्रप्रसादन भुजाओं की, आशाप्रपूरक हाथों की, शत्रुनाशक पद्महस्त उंगलियों-नखों की रक्षा करें। विश्वव्यापी मयूरेश सम्पूर्ण अंगों की सदा रक्षा करें, और जो स्थान वर्णन से छूट गया हो, उसकी धूम्रकेतु सदा रक्षा करें।

दिशाओं, काल और गुणों की रक्षा

आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु ।

प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ २८॥


दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैरृत्यां तु गणेश्वरः ।

प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद् वायव्यां गजकर्णकः ॥ २९॥


कौबेर्य्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः ।

दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत् ॥ ३०॥


राक्षसासुरवेतालग्रहभूतपिशाचतः ।

पाशाङ्कुशधरः पातु रजः सत्त्वं तमः स्मृतिम् ॥ ३१॥


ज्ञानं धर्मञ्च लक्ष्मीञ्च लज्जां कीर्तिं दयां कुलम् ।

वपुर्धनं चधान्यं चगृहान् दारान् सुतान् सखीन् ॥ ३२॥


सर्वायुधधरः पौत्रान् मयूरेशोऽवतात् सदा ।

कपिलोऽजाविकं पातु गवाश्वं विकटोऽवतु ॥ ३३॥

हिंदी अर्थ: आमोद सामने से, प्रमोद पीछे से रक्षा करें। पूर्व दिशा में बुद्धीश, आग्नेय दिशा में सिद्धिदायक रक्षा करें। दक्षिण दिशा में उमापुत्र, नैऋत्य में गणेश्वर, पश्चिम में विघ्नहर्ता, वायव्य में गजकर्णक रक्षा करें। उत्तर (कुबेर-दिशा) में निधिप, ईशान में ईशनंदन रक्षा करें। दिन में एकदंत, रात्रि और संध्याओं में विघ्नहृत रक्षा करें। राक्षस, असुर, वेताल, ग्रह, भूत, पिशाच से पाश-अंकुशधारी रक्षा करें, तथा मेरे रज, सत्त्व, तम गुणों और स्मृति की भी रक्षा करें। मेरे ज्ञान, धर्म, लक्ष्मी, लज्जा, कीर्ति, दया, कुल, शरीर, धन, धान्य, घर, पत्नी, पुत्र और मित्रों की रक्षा हो। सर्वायुधधारी मयूरेश सदा मेरे पौत्रों की रक्षा करें। कपिल मेरी बकरी-भेड़ों की, विकट मेरी गायों-घोड़ों की रक्षा करें।

धारण-विधि और फलश्रुति

भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कण्ठे धारयेत् सुधीः ।

न भयं जायते तस्य यक्षरक्षः पिशाचतः ॥ ३४॥


त्रिसन्ध्यं जपते यस्तु वज्रसारतनुर्भवेत् ।

यात्राकाले पठेद् यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥ ३५॥


युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं प्राप्नुयाद् ध्रुवम् ।

मारणोच्चाटनाकर्षस्तम्भमोहनकर्मणि ॥ ३६॥


सप्तवारं पठेद् यस्तु दिनानामेकविंशतिम् ।

तत् तत् फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ ३७॥


एकविंशतिवारञ्च पठेत् तावद् दिनानि यः ।

कारागृहगतं सद्यो राज्ञा वध्यं चमोचयेत् ॥ ३८॥


राजदर्शनवेलायां पठेदेतत् त्रिवारतः ।

स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतिं चसभां जयेत् ॥ ३९॥


इदं गणेशकवचं मुद्गलेन समीरितम् ।

कश्यपाय च तेनाऽथ माण्डव्याय महर्षये ॥ ४०॥


मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्वसिद्धिदम् ।

न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ।

सर्वरक्षाकरं सर्वमनःकामप्रपूरकम् ॥ ४१॥


अनेनास्य कृता रक्षा न बाधाऽस्य भवेत् क्वचित् ।

राक्षसासुरवेतालदैत्यदानवसम्भवा ॥ ४२॥


इति श्रीगणेशपुराणान्तर्गतं मुद्गलकृतं गणेशकवचं सम्पूर्णम् ।

हिंदी अर्थ: जो बुद्धिमान इसे भोजपत्र पर लिखकर गले में धारण करता है, उसे यक्ष-राक्षस-पिशाच से कोई भय नहीं होता। जो त्रिकाल (प्रातः-मध्याह्न-सायं) जप करता है, उसका शरीर वज्र के समान दृढ़ हो जाता है। यात्रा के समय पढ़ने वाला निर्विघ्न फल प्राप्त करता है। युद्ध के समय पढ़ने वाला निश्चित विजय प्राप्त करता है। मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तंभन, मोहन जैसे कर्मों में सात दिन तक सात बार पढ़ने वाला साधक वह-वह फल प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं। इक्कीस दिनों तक इक्कीस बार पढ़ने वाला कारागार में बंद और राजा द्वारा वध्य घोषित व्यक्ति को भी तत्काल मुक्त करा सकता है। राजा के दर्शन के समय तीन बार इसे पढ़ने वाला राजा को वश में करके सभा और मंत्रियों पर भी विजय प्राप्त करता है। यह गणेश कवच मुद्गल द्वारा कहा गया, तथा उन्होंने इसे कश्यप को, और कश्यप ने आगे महर्षि माण्डव्य को बताया। उन्होंने कृपापूर्वक मुझे यह सर्वसिद्धिदायक कवच बताया — यह भक्तिहीन को नहीं देना चाहिए, केवल श्रद्धावान को ही यह शुभ कवच देना चाहिए, जो सर्वरक्षाकारी और मन की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इससे की गई रक्षा से साधक को राक्षस, असुर, वेताल, दैत्य, दानवों से उत्पन्न कोई भी बाधा कभी नहीं होती।

इस प्रकार श्री गणेश पुराण में वर्णित यह मुद्गलकृत गणेश कवच सम्पूर्ण होता है।

इस विस्तृत कवच की विशेषताएं — हरिद्रा कवच से तुलना

इस विस्तृत कवच की तुलना पहले कवर किए गए हरिद्रा गणेश कवच से करने पर कई विशिष्टताएं उभरती हैं:

1. चतुर्युग-स्वरूप का ध्यान: यह कवच आरंभ में ही गणेश जी के चारों युगों (सतयुग-सिंहवाहन, त्रेता-मयूरवाहन, द्वापर-गजानन चतुर्भुज, कलियुग-द्विभुज श्वेत) के अलग-अलग स्वरूपों का ध्यान कराता है, जो हरिद्रा कवच में नहीं मिलता।

2. अधिक विस्तृत अंग-न्यास: यह कवच शरीर के कहीं अधिक सूक्ष्म अंगों — जैसे उंगलियां, नख, टखने, पिंडलियां — तक की सुरक्षा का वर्णन करता है।

3. दिशाओं की पूर्ण सुरक्षा: यह आठों दिशाओं (पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर, ईशान) में अलग-अलग गणेश-स्वरूपों की सुरक्षा का उल्लेख करता है।

4. जीवन के अमूर्त पहलुओं की रक्षा: यह केवल शरीर तक सीमित नहीं, बल्कि ज्ञान, धर्म, लक्ष्मी, लज्जा, कीर्ति, स्मृति, गुण (सत्व-रज-तम) और परिवार-पशुधन तक की सुरक्षा का वर्णन करता है।

5. विशिष्ट प्रयोगों का उल्लेख: यह कारागार-मुक्ति, राजा को वश में करना, युद्ध-विजय, यात्रा-सुरक्षा जैसे विशिष्ट व्यावहारिक प्रयोगों की विस्तृत विधि भी बताता है।

मुद्गलकृत गणेश कवच पाठ की सही विधि

  1. अधिकार: स्वयं कवच में स्पष्ट कहा गया है — "न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते" अर्थात यह केवल श्रद्धावान भक्त को ही दिया जाना चाहिए।
  2. त्रिसंध्या जप: प्रातः, मध्याह्न और सायं — तीनों समय जप करने से शरीर वज्र के समान दृढ़ बनता है।
  3. धारण-विधि: भोजपत्र पर लिखकर गले में धारण करने की पारंपरिक विधि भी वर्णित है।
  4. विशेष अवसरों पर: यात्रा, युद्ध, राजा (या उच्च अधिकारी) से भेंट, या किसी कानूनी संकट के समय विशेष विधि से पाठ करने का उल्लेख है।

यह कवच किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है

  • कानूनी संकट और कारागार-मुक्ति में: इक्कीस दिनों तक इक्कीस बार पाठ करने से कारागार से मुक्ति तक का विशिष्ट वरदान वर्णित है।
  • यात्रा-सुरक्षा हेतु: यात्रा के समय पाठ करने से निर्विघ्न यात्रा का वरदान है।
  • प्रतिस्पर्धा और उच्च-अधिकारी से भेंट में: राजा या अधिकारी से मिलने से पूर्व पाठ करने से उन्हें अनुकूल बनाने का उल्लेख है।
  • सर्वांगीण सुरक्षा हेतु: शरीर, परिवार, धन, पशुधन — जीवन के हर पहलू की सुरक्षा हेतु यह सर्वाधिक व्यापक कवच माना जाता है।

जब स्वयं विधिवत पाठ या धारण करना संभव न हो

चूंकि यह कवच अत्यंत विस्तृत और विशिष्ट प्रयोगों से जुड़ा है, इसलिए इसका शुद्ध उच्चारण और सही विधि किसी अनुभवी आचार्य से सीखना अधिक उचित है।

यदि आप कानूनी संकट, यात्रा-सुरक्षा या किसी उच्च-अधिकारी से जुड़े मामले में गणपति जी की विशेष कृपा चाहते हैं, तो 20 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाले ज्योतिषी प्रशांत दैवज्ञ से जुड़कर ऑनलाइन गणपति कवच अनुष्ठान (लाइव वीडियो के माध्यम से) करवा सकते हैं। साथ ही, अपनी कुंडली में कानूनी मामलों और संकट-निवारण से जुड़े भावों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए मात्र ₹251 में उपलब्ध 35-पृष्ठ की विस्तृत ऑनलाइन जन्मकुंडली रिपोर्ट सहायक सिद्ध होगी।

निष्कर्ष

मुद्गलकृतं गणेशकवचम् गणेश-कवच परंपरा में सबसे विस्तृत और व्यापक रचनाओं में से एक है। चार युगों के चार स्वरूपों से लेकर सूक्ष्मतम शारीरिक अंगों, आठों दिशाओं और जीवन के अमूर्त पहलुओं तक — यह कवच साधक को हर स्तर पर पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। जो साधक श्रद्धापूर्वक और विधिवत इसका पाठ करता है, वह न केवल दैनिक जीवन की बाधाओं से, बल्कि कारागार जैसे गंभीरतम संकटों से भी मुक्ति पा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: यह विस्तृत गणेश कवच किस ग्रंथ से लिया गया है? यह कवच गणेश पुराण के क्रीड़ाखंड (उत्तरखंड) के 85वें अध्याय में वर्णित है। इसकी रचना महर्षि मुद्गल ने की, जिन्होंने इसे कश्यप ऋषि को, और कश्यप ने आगे महर्षि माण्डव्य को प्रदान किया।

प्रश्न 2: यह कवच हरिद्रा गणेश कवच से किस प्रकार भिन्न है? यह कवच कहीं अधिक विस्तृत है — इसमें चार युगों के चार अलग-अलग स्वरूपों का ध्यान, अधिक सूक्ष्म अंगों की सुरक्षा, आठों दिशाओं का वर्णन, तथा धर्म-धन-परिवार जैसे अमूर्त पहलुओं की सुरक्षा भी सम्मिलित है, जो हरिद्रा कवच में नहीं मिलती।

प्रश्न 3: इस कवच की सबसे विशिष्ट फलश्रुति क्या है? इस कवच की सबसे विशिष्ट फलश्रुति यह है कि इक्कीस दिनों तक इक्कीस बार पाठ करने से कारागार में बंद और मृत्युदंड की सजा पाए व्यक्ति को भी तत्काल मुक्ति मिल सकती है, तथा राजा या उच्च अधिकारी को वश में करने का भी वर्णन है।

प्रश्न 4: इस कवच को किसे नहीं देना चाहिए? स्वयं कवच में स्पष्ट निर्देश है — "न देयं भक्तिहीनाय" अर्थात यह भक्तिहीन व्यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए। इसे केवल श्रद्धावान और योग्य भक्त को ही प्रदान करना चाहिए।

प्रश्न 5: इस कवच का पाठ कैसे करना चाहिए? इसे त्रिसंध्या (प्रातः, मध्याह्न, सायं) जपने से शरीर वज्र के समान दृढ़ होता है। भोजपत्र पर लिखकर गले में धारण करने की भी परंपरा है, विशेषकर यक्ष-राक्षस-पिशाच बाधा से सुरक्षा हेतु।

अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

लेखक: Admin

श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती

प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026

स्थिति: प्रकाशित