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इन्द्रकृत गणेश स्तुति: जब देवताओं के राजा ने भी मांगी विघ्न-मुक्ति

इन्द्रकृत गणेश स्तुति: जब देवताओं के राजा ने भी मांगी विघ्न-मुक्ति

मुद्गल पुराण में वर्णित इन्द्रकृता श्रीगणेशस्तुतिः का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और महत्व जानें। स्वयं देवराज इंद्र द्वारा रचित यह स्तुति भुक्ति-मुक्ति दोनों प्रदान करने वाली है।

Indrakrita Ganesh Stuti: When Even the King of the Gods Sought Freedom From Obstacles

जब स्वर्ग के अधिपति भी गणपति की शरण में गए

देवराज इंद्र — स्वर्गलोक के अधिपति, त्रिलोक के शासक, समस्त देवताओं के राजा — जब वे स्वयं किसी की स्तुति करने के लिए हाथ जोड़कर खड़े हों, तो यह प्रसंग अपने आप में असाधारण हो जाता है। मुद्गल पुराण में ठीक ऐसा ही एक प्रसंग वर्णित है, जहां स्वयं इन्द्र भगवान गणेश की स्तुति करते हैं और उनसे विघ्न-मुक्ति तथा वरदान की कामना करते हैं। यही स्तुति इन्द्रकृता श्रीगणेशस्तुतिः के नाम से जानी जाती है।

यह स्तुति मुद्गल पुराण के तृतीय खंड के 30वें अध्याय में वर्णित है, जिसे स्वयं ऋषि मुद्गल ने सुनाया था। इस प्रसंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गणेश जी इंद्र की स्तुति से इतने प्रसन्न होते हैं कि वे स्वयं इंद्र को यह आदेश देते हैं कि वे भी नित्य इस स्तोत्र का पाठ करें, ताकि वे स्वयं भी सदा विघ्न-रहित रहें। यह इस बात का प्रमाण है कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली या ऐश्वर्यशाली क्यों न हो, गणपति की कृपा के बिना कोई भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं है।

मुद्गल पुराण में इस स्तुति का संदर्भ

मुद्गल पुराण गणेश-भक्ति का एक प्रमुख ग्रंथ है, और यह स्तुति इसके तृतीय खंड के 30वें अध्याय के 24वें से 36वें श्लोक में वर्णित है। इस प्रसंग में इंद्र अपनी स्तुति के माध्यम से गणेश जी के ब्रह्म-स्वरूप, उनकी अनंतता, तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने की उनकी क्षमता का वर्णन करते हैं। स्तुति के अंत में गणेश जी न केवल प्रसन्न होते हैं, बल्कि इसे "भुक्तिमुक्तिप्रदं" अर्थात भौतिक सुख और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाला स्तोत्र घोषित करते हैं — ठीक उसी प्रकार जैसे उन्होंने महालक्ष्मी द्वारा रचित स्तोत्र को भी यही वरदान दिया था।

इन्द्रकृता श्रीगणेशस्तुतिः — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

स्तुति का आरंभ — गणेश जी की सर्वोच्चता

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥


इन्द्र उवाच ।


नमस्तेऽस्तु गणाध्यक्ष भक्तेभ्यः सिद्धिदायक ।

विनायकाय देवाय हेरम्बाय नमो नमः ॥ २४॥


अनादये च सर्वेषामादिभूताय ते नमः ।

आदिपूज्याय विघ्नेश सर्वपूज्याय वै नमः ॥ २५॥


आदिमध्यान्तहीनाय ह्यादिमध्यमयाय च ।

अन्त्यरूपाय देवेश विघ्नहर्त्रे नमो नमः ॥ २६॥

हिंदी अर्थ: इंद्र ने कहा — हे गणाध्यक्ष! आपको नमस्कार है, जो भक्तों को सिद्धि प्रदान करने वाले हैं। हे विनायक! हे देव! हे हेरम्ब! आपको बारंबार नमस्कार है। जो अनादि हैं, जो सबके आदि-भूत (मूल कारण) हैं, हे विघ्नेश! जो सबसे पहले पूज्य हैं, जो सर्वपूज्य हैं — उन आपको नमस्कार है। जो आदि-मध्य-अंत से रहित हैं, फिर भी आदि-मध्य स्वरूप हैं, हे देवेश! जो अंतिम स्वरूप भी हैं, हे विघ्नहर्ता! आपको बारंबार नमस्कार है।

शक्ति और वाहन का वर्णन

पाशाङ्कुशधरायैव सिंहवाहाय ते नमः ।

अमेयाय नमस्तुभ्यं नानामायाधराय च ॥ २७॥


विघ्नकर्त्रे ह्यभक्तानां सदा स्वानन्दवासिने ।

सिद्धिबुद्धिपते तुभ्यं नाभिशेषाय ते नमः ॥ २८॥

हिंदी अर्थ: जो पाश और अंकुश धारण करते हैं, जो सिंह-वाहन पर सवार हैं — उन आपको नमस्कार है। जो अमेय (जिनकी माप न की जा सके) हैं, जो अनेक मायाओं को धारण करने वाले हैं। जो अभक्तों के लिए विघ्न उत्पन्न करने वाले हैं, जो सदा अपने आनंद में निवास करते हैं, हे सिद्धि-बुद्धि के स्वामी! जो शेष-रहित (अनंत) हैं — उन आपको नमस्कार है।

ब्रह्म-स्वरूप और पुरुषार्थ-दाता

ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय ब्रह्मदात्रे कृपालवे ।

धर्मार्थकाममोक्षाणां दात्रे ते वै नमो नमः ॥ २९॥


पूर्णाय पूर्णभावज्ञ पूर्णानन्दप्रदाय वै ।

कर्त्रे हर्त्रे च पात्रे ते गणेशाय नमो नमः ॥ ३०॥


सूक्ष्मेषु सूक्ष्मरूपाय स्थूलेषु स्थूलभोगिने ।

स्थूलसूक्ष्मादिहीनाय लम्बोदर नमोऽस्तु ते ॥ ३१॥

हिंदी अर्थ: हे ब्रह्म! हे ब्रह्मरूप! हे ब्रह्म प्रदान करने वाले कृपालु! जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों को देने वाले हैं — उन आपको बारंबार नमस्कार है। हे पूर्णभाव के ज्ञाता! जो पूर्ण हैं, जो पूर्ण आनंद प्रदान करने वाले हैं, जो सृष्टि के कर्ता, संहारकर्ता और पालनकर्ता हैं — उन गणेश जी को नमस्कार है। जो सूक्ष्म वस्तुओं में सूक्ष्म-स्वरूप हैं, जो स्थूल वस्तुओं में स्थूल-भोगी हैं, फिर भी जो स्थूल-सूक्ष्म आदि भेदों से रहित हैं — हे लंबोदर! आपको नमस्कार है।

स्तुति का समापन

किं स्तौमि त्वां सदा शान्तिरूपं तस्मान्नमो नमः ।

तेन तुष्टो भव स्वामिन् दयाकाराय ते नमः ॥ ३२॥

हिंदी अर्थ: मैं आपकी क्या स्तुति करूं, जो सदा शांति-स्वरूप हैं? इसलिए मैं केवल बारंबार नमस्कार ही करता हूं। हे स्वामी! इसी से आप प्रसन्न हो जाइए, हे दयालु! आपको नमस्कार है।

कथा का समापन और फलश्रुति

मुद्गल उवाच ।


एवं स्तुतिं समाकर्ण्य मघवन्तमुवाच ह ।

गणेशो भक्तिभावेन सन्तुष्टो भक्तमुत्तमम् ॥ ३३॥


गणेश उवाच ।


इन्द्र त्वया कृतं स्तोत्रं भुक्तिमुक्तिप्रदं भवेत् ।

यः पठेच्छृणुयाच्चेद्यस्तस्मै सर्वार्थदं तथा ॥ ३४॥


नित्यं त्वमपि देवेन्द्र पठ स्तोत्रं प्रयत्नतः ।

तेन विघ्नविहीनस्तु भविष्यसि महामते ॥ ३५॥


वरान् ब्रूहि महाभाग ये ते चित्ते भवन्ति वै ।

तान् दास्यामि न सन्देहो भक्त्या स्तोत्रेण तोषितः ॥ ३६॥


इति इन्द्रकृता श्रीगणेशस्तुतिः सम्पूर्णा ॥

हिंदी अर्थ: मुद्गल ऋषि ने कहा — इस प्रकार इंद्र की स्तुति सुनकर, भक्तिभाव से संतुष्ट हुए गणेश जी ने उस श्रेष्ठ भक्त इंद्र से कहा। गणेश जी ने कहा — "हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा रचित यह स्तोत्र भुक्ति (भौतिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाला होगा। जो भी इसे पढ़ेगा या सुनेगा, उसे यह सभी अर्थ-सिद्धि प्रदान करेगा। हे देवेंद्र! हे महामते! तुम भी नित्य प्रयत्नपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करो, जिससे तुम सदा विघ्न-रहित रहोगे। हे महाभाग! तुम्हारे मन में जो भी वरदान चाहिए, वह मांग लो — मैं तुम्हें अवश्य दूंगा, इसमें कोई संदेह नहीं, क्योंकि मैं तुम्हारी भक्ति और इस स्तोत्र से संतुष्ट हूं।"

इस प्रकार यह इन्द्रकृत श्रीगणेश स्तुति सम्पूर्ण होती है।

इस स्तुति का गहरा संदेश

इस प्रसंग की सबसे मार्मिक बात यह है कि गणेश जी इंद्र को स्वयं आदेश देते हैं कि वे भी नित्य इस स्तोत्र का पाठ करें — "नित्यं त्वमपि देवेन्द्र पठ स्तोत्रं प्रयत्नतः।" यह हमें यह गहरा संदेश देता है कि केवल एक बार स्तुति कर देना पर्याप्त नहीं है; निरंतरता ही वास्तविक सुरक्षा और कृपा सुनिश्चित करती है। भले ही इंद्र जैसे शक्तिशाली देवता ने एक बार गणेश जी को प्रसन्न कर लिया हो, फिर भी उन्हें नियमित पाठ करने की सलाह दी गई — यह दर्शाता है कि विघ्न-मुक्ति एक सतत साधना है, एकमुश्त उपलब्धि नहीं।

इसके अतिरिक्त, "धर्मार्थकाममोक्षाणां दात्रे" पंक्ति यह स्पष्ट करती है कि गणेश जी केवल भौतिक इच्छाओं की ही नहीं, बल्कि जीवन के चारों पुरुषार्थों की पूर्ति करने वाले हैं — यह उन्हें एक सम्पूर्ण, सर्वांगीण देवता के रूप में स्थापित करता है।

इन्द्रकृत गणेश स्तुति पाठ की सही विधि

  1. समय: प्रातःकाल अथवा किसी भी महत्वपूर्ण कार्य, पद-प्रतिष्ठा या नेतृत्व से जुड़े निर्णय से पूर्व इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
  2. भाव: इंद्र जैसे शक्तिशाली देवता की विनम्रता का स्मरण करते हुए, अपने अहंकार को त्यागकर श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
  3. पूजन सामग्री: गणेश प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित करें, लाल पुष्प और मोदक अर्पित करें।
  4. नियमितता: स्वयं गणेश जी द्वारा दिए गए निर्देश के अनुसार, इसे नित्य नियमित रूप से पढ़ना ही वास्तविक विघ्न-मुक्ति सुनिश्चित करता है।
  5. नेतृत्व की भूमिका में विशेष: जो लोग नेतृत्व, प्रबंधन या किसी बड़ी जिम्मेदारी की भूमिका में हैं, उनके लिए यह स्तुति विशेष उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि यह स्वयं देवताओं के राजा द्वारा रचित है।

यह स्तुति किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है

  • नेतृत्व और पद-प्रतिष्ठा में स्थिरता हेतु: चूंकि यह स्तुति स्वयं देवराज इंद्र द्वारा रचित है, इसलिए उच्च पद, नेतृत्व या अधिकार की भूमिका में स्थिरता चाहने वालों के लिए यह विशेष उपयुक्त है।
  • भुक्ति और मुक्ति दोनों हेतु: फलश्रुति के अनुसार यह स्तोत्र भौतिक सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक मोक्ष — दोनों प्रदान करता है।
  • निरंतर विघ्नों से त्रस्त होने पर: यदि जीवन में बार-बार बाधाएं आ रही हों, तो इस स्तुति का नित्य पाठ स्थायी समाधान प्रदान कर सकता है।
  • सर्वार्थ-सिद्धि हेतु: "सर्वार्थदं" अर्थात यह जीवन के समस्त उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक माना जाता है।

जब स्वयं विधिवत पाठ करना संभव न हो

यदि आप जीवन में बार-बार आने वाले विघ्नों, पद-प्रतिष्ठा में अस्थिरता, या किसी बड़े निर्णय से पहले गणपति जी की विशेष कृपा चाहते हैं, तो 20 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाले ज्योतिषी प्रशांत दैवज्ञ से जुड़कर ऑनलाइन गणपति अनुष्ठान (लाइव वीडियो के माध्यम से) करवा सकते हैं। साथ ही, अपनी कुंडली में कर्म भाव और भाग्य भाव की वास्तविक स्थिति जानने के लिए मात्र ₹251 में उपलब्ध 35-पृष्ठ की विस्तृत ऑनलाइन जन्मकुंडली रिपोर्ट सहायक सिद्ध होगी।

निष्कर्ष

इन्द्रकृत गणेश स्तुति हमें यह गहरा संदेश देती है कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली, ऐश्वर्यशाली या ऊंचे पद पर क्यों न हो, गणपति की कृपा और नियमित स्मरण के बिना कोई भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं है। स्वयं देवराज इंद्र द्वारा रचित यह स्तुति भक्ति, विनम्रता और निरंतरता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है। जो साधक श्रद्धापूर्वक और नियमित रूप से इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह निश्चय ही भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करता है, जैसा स्वयं गणेश जी ने वरदान स्वरूप कहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: इन्द्रकृत गणेश स्तुति किस पुराण से लिया गया है? यह स्तुति मुद्गल पुराण के तृतीय खंड के 30वें अध्याय में वर्णित है। इसे स्वयं देवराज इंद्र द्वारा रचित बताया गया है, जिन्होंने भगवान गणेश की स्तुति करते हुए विघ्न-मुक्ति और वरदान की कामना की थी।

प्रश्न 2: गणेश जी ने इंद्र को क्या विशेष निर्देश दिया? गणेश जी ने इंद्र को कहा कि वे स्वयं भी नित्य प्रयत्नपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करें, जिससे वे सदा विघ्न-रहित रहेंगे। यह दर्शाता है कि निरंतर साधना ही स्थायी सुरक्षा सुनिश्चित करती है, चाहे भक्त कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।

प्रश्न 3: इस स्तुति को "भुक्तिमुक्तिप्रदं" क्यों कहा गया है? स्वयं गणेश जी ने फलश्रुति में कहा है कि यह स्तोत्र भुक्ति (भौतिक सुख-समृद्धि) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाला है, जो इसे एक साथ सांसारिक और आध्यात्मिक — दोनों प्रकार के लाभ देने वाला विशिष्ट स्तोत्र बनाता है।

प्रश्न 4: यह स्तुति किनके लिए विशेष उपयुक्त है? यह स्तुति विशेष रूप से नेतृत्व, उच्च पद या बड़ी जिम्मेदारी की भूमिका में स्थिरता चाहने वालों के लिए उपयुक्त है, क्योंकि यह स्वयं देवताओं के राजा इंद्र द्वारा रचित है, जो पद-प्रतिष्ठा और अधिकार से जुड़ी हर चुनौती को समझते थे।

प्रश्न 5: इस स्तुति के पाठ से क्या लाभ मिलते हैं? फलश्रुति के अनुसार इस स्तुति के पाठ से समस्त अर्थ-सिद्धि, विघ्न-मुक्ति, तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। नियमित पाठ करने वाला साधक निरंतर गणपति की कृपा से सुरक्षित रहता है।

अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

लेखक: Admin

श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती

प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026

स्थिति: प्रकाशित