Astro Pujatirth logo
← सभी ब्लॉग
स्कंदपुराण में वर्णित काल भैरव कथा — काशी के कोतवाल की उत्पत्ति और पूजा विधि

स्कंदपुराण में वर्णित काल भैरव कथा — काशी के कोतवाल की उत्पत्ति और पूजा विधि

स्कंदपुराण में वर्णित काल भैरव कथा, ब्रह्मा जी के पांचवें मस्तक कटने का प्रसंग, काशी के कोतवाल की उत्पत्ति, भैरव पूजा विधि और दर्शन का महत्व विस्तार से जानें।

स्कंदपुराण में वर्णित काल भैरव कथा — काशी के कोतवाल की उत्पत्ति और पूजा विधि

काल भैरव को काशी नगरी का कोतवाल (रक्षक) माना जाता है, और मान्यता है कि काशी में किसी भी तीर्थ यात्रा की शुरुआत या समापन बिना काल भैरव के दर्शन के अपूर्ण माना जाता है। स्कंदपुराण के काशी खंड में काल भैरव की उत्पत्ति और उनकी महिमा की अत्यंत रोचक कथा का वर्णन मिलता है।

ब्रह्मा जी के पांचवें मस्तक की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में भगवान ब्रह्मा के पांच मस्तक थे। एक बार ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के मध्य यह विवाद उत्पन्न हुआ कि दोनों में से सर्वश्रेष्ठ और सृष्टि का वास्तविक स्रोत कौन है। इस विवाद को सुलझाने के लिए भगवान शिव एक विशाल ज्योति स्तंभ (लिंग) के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि जो भी इस स्तंभ का आदि या अंत खोज लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ माना जाएगा।

ब्रह्मा जी का असत्य कथन

भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण करके स्तंभ के अंत की खोज की और भगवान ब्रह्मा ने हंस रूप धारण करके स्तंभ के शीर्ष की खोज की। दोनों को ही अपनी-अपनी दिशा में स्तंभ का कोई अंत नहीं मिला। भगवान विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली, परंतु ब्रह्मा जी ने अहंकारवश यह असत्य कह दिया कि उन्होंने स्तंभ का शीर्ष खोज लिया है और इसके साक्ष्य के रूप में उन्होंने केतकी के फूल को भी झूठी गवाही देने के लिए राजी कर लिया।

शिव जी का क्रोध और पांचवें मस्तक का दंड

ब्रह्मा जी के इस असत्य व्यवहार से क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने भैरव स्वरूप को प्रकट किया, जिन्हें "काल भैरव" कहा गया। काल भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा जी के पांचवें (अहंकारी) मस्तक को काट दिया, जिससे ब्रह्मा जी के केवल चार मस्तक ही शेष रह गए, जो आज भी उनके स्वरूप में देखे जाते हैं। इसके साथ ही झूठी गवाही देने के कारण केतकी के फूल को भी शिव पूजा में वर्जित घोषित कर दिया गया।

ब्रह्महत्या का दोष और काशी यात्रा

भगवान ब्रह्मा का मस्तक काटने के कारण काल भैरव को ब्रह्महत्या का दोष लगा, जिससे कटा हुआ मस्तक उनके हाथ से चिपक गया और वे इस दोष से मुक्त होने के लिए तीर्थ-तीर्थ भटकने लगे। अंततः जब वे काशी नगरी में प्रवेश किए, तो स्वयं काशी की पवित्रता के प्रभाव से उनके हाथ से मस्तक अलग हो गया और उन्हें ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति प्राप्त हुई।

काशी के कोतवाल की उपाधि

इस घटना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने काल भैरव को काशी नगरी की रक्षा का दायित्व सौंपा और उन्हें "काशी कोतवाल" की उपाधि प्रदान की। मान्यता है कि काल भैरव के आशीर्वाद के बिना काशी में कोई भी व्यक्ति स्थायी रूप से निवास नहीं कर सकता, और यहां आने वाले प्रत्येक भक्त को सबसे पहले उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।

काल भैरव पूजा विधि

काल भैरव की पूजा में काली उड़द, तिल का तेल, नारियल और काले कुत्ते को भोजन देने की विशेष परंपरा है, क्योंकि कुत्ता काल भैरव का वाहन माना जाता है। भक्त उन्हें मदिरा भी अर्पित करते हैं, जिसे बाद में प्रसाद स्वरूप ग्रहण नहीं किया जाता।

काल भैरव दर्शन का महत्व

स्कंदपुराण में वर्णित है कि काशी यात्रा करने वाले भक्तों को सर्वप्रथम काल भैरव के दर्शन करने चाहिए, क्योंकि उनकी अनुमति के बिना काशी में की गई यात्रा अपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि काल भैरव के दर्शन से भय, नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं से रक्षा होती है।

भैरव अष्टमी का महत्व

काल भैरव के प्राकट्य दिवस को भैरव अष्टमी या कालभैरव जयंती के रूप में मनाया जाता है, जो मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष अष्टमी को आती है। इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करने से भक्तों की समस्त बाधाएं दूर होती हैं।

निष्कर्ष

स्कंदपुराण में वर्णित काल भैरव की यह कथा हमें सत्य के महत्व और अहंकार के दुष्परिणाम की गहन शिक्षा देती है। काशी के रक्षक के रूप में काल भैरव की महिमा आज भी भक्तों को सुरक्षा, साहस और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: काल भैरव की उत्पत्ति कैसे हुई? उत्तर: ब्रह्मा-विष्णु विवाद को सुलझाने हेतु शिव जी ज्योति स्तंभ रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के असत्य कथन पर क्रोधित होकर शिव जी ने काल भैरव स्वरूप प्रकट किया, जिन्होंने ब्रह्मा जी के अहंकारी पांचवें मस्तक को काट दिया।

प्रश्न 2: काल भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहा जाता है? उत्तर: ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति के लिए काशी आने पर काल भैरव को दोष से मुक्ति मिली, जिससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें काशी नगरी की रक्षा का दायित्व सौंपकर काशी कोतवाल की उपाधि प्रदान की।

प्रश्न 3: केतकी का फूल शिव पूजा में वर्जित क्यों है? उत्तर: ब्रह्मा-विष्णु विवाद में केतकी के फूल ने ब्रह्मा जी के पक्ष में झूठी गवाही दी थी, जिस कारण भगवान शिव ने इसे शिव पूजा में सदैव के लिए वर्जित घोषित कर दिया।

प्रश्न 4: काल भैरव पूजा में क्या अर्पित किया जाता है? उत्तर: काल भैरव पूजा में काली उड़द, तिल का तेल, नारियल और काले कुत्ते को भोजन दिया जाता है, क्योंकि कुत्ता उनका वाहन माना जाता है। भक्त मदिरा भी अर्पित करते हैं।

प्रश्न 5: काशी में काल भैरव दर्शन क्यों आवश्यक माना जाता है? उत्तर: स्कंदपुराण के अनुसार काशी यात्रा में सर्वप्रथम काल भैरव के दर्शन करना आवश्यक माना जाता है, क्योंकि उनकी अनुमति के बिना काशी यात्रा अपूर्ण मानी जाती है और यह भय व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है।

अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है, केवल सामान्य जानकारी हेतु है। व्यक्तिगत निर्णय लेने से पूर्व विद्वान पंडित या गुरु से परामर्श अवश्य करें।

लेखक: Admin

श्रेणी: सनातन ज्ञान

प्रकाशन तिथि: 4 अगस्त 2026

स्थिति: प्रकाशित