
लम्बोदर स्तोत्रम्: दो महर्षियों की संयुक्त स्तुति जो सर्वसिद्धि का वरदान देती है
मुद्गल पुराण में वर्णित असितवत्सरकृता लम्बोदरस्तुतिः का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और महत्व जानें। दो महर्षियों द्वारा रचित यह स्तुति सर्वसिद्धि और भक्ति दोनों प्रदान करती है।
Lambodara Stotram: The Joint Hymn of Two Sages That Grants Complete Siddhi
"लम्बोदर" — विराट उदर में सम्पूर्ण सृष्टि समेटे हुए गणेश
गणेश जी के सबसे प्रचलित नामों में से एक है लम्बोदर — अर्थात बड़े और लंबे उदर (पेट) वाले। यद्यपि सतही तौर पर यह केवल एक शारीरिक विशेषता प्रतीत होती है, परंतु गहराई से देखें तो यह नाम एक गूढ़ दार्शनिक सत्य को दर्शाता है — गणेश जी का उदर सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समेटे हुए है, ठीक वैसे ही जैसे विराट पुरुष के भीतर सम्पूर्ण सृष्टि समाहित रहती है।
इसी लम्बोदर-स्वरूप को समर्पित असितवत्सरकृता लम्बोदरस्तुतिः मुद्गल पुराण के पंचम खंड के दसवें अध्याय में वर्णित एक अत्यंत सुंदर स्तुति है, जिसकी रचना दो महर्षियों — असित और वत्सर — ने संयुक्त रूप से की थी। यह स्तुति पंद्रह श्लोकों में गणेश जी के विभिन्न स्वरूपों, नामों और शक्तियों का विस्तृत वर्णन करती है।
असितवत्सरकृता लम्बोदरस्तुतिः — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
असितवत्सरावूचतुः ।
लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं योगरूपिणे ।
योगाकारशरीराय योगशान्तिप्रदायिने ॥ २४॥
विघ्नेशाय महाभक्तानां विघ्नहरणाय च ।
अभक्तानां महाविघ्नकारिणे ते नमो नमः ॥ २५॥
स्वानन्दवासिने तुभ्यं सदा स्वानन्ददायिने ।
मूषकवाहनायैव मूषकध्वज वै नमः ॥ २६॥
अनाथाय गणेशाय सर्वेषां नाथरूपिणे ।
नाथानां नाथरूपाय विनायक नमोऽस्तु ते ॥ २७॥
हेरम्बाय च सर्वेषां मात्रे पित्रे नमो नमः ।
ज्येष्ठराजाय ज्येष्ठाय ज्येष्ठानां ज्येष्ठ ते नमः ॥ २८॥
अमेयायाऽप्रमेयायाऽनन्तखेलकराय ते ।
अनन्तानन्तरूपायानन्तदाय नमो नमः ॥ २९॥
सिद्धिबुद्धिपते नाथ भक्तसंरक्षकाय च ।
नानाशक्तिप्रपालायानन्तमायाविहारिणे ॥ ३०॥
गजवक्त्राय सर्वेषामादिपूज्याय ते नमः ।
सर्वपूज्याय सर्वेषां सिद्धिदाय नमो नमः ॥ ३१॥
वक्रतुण्डाय वीराय चैकदन्ताय ते नमः ।
महोदराय देवाय देवदेवेश ते नमः ॥ ३२॥
असुराणां सहायाय नानावरप्रदाय च ।
असुराणां निहन्त्रे त आसुराय नमो नमः ॥ ३३॥
ब्रह्मणां पतये तुभ्यं ब्रह्मणां ब्रह्मवादिने ।
ब्रह्माकाराय वै ढुण्ढे वेदवेद्याय ते नमः ॥ ३४॥
मनोवाणी विहीनाय मनोवाणीमयाय च ।
योगेशाय परेशाय सर्वामयविवर्जित ॥ ३५॥
किं स्तुवस्त्वां गणाधीश यत्र शान्तिं समागताः ।
वेदा योगीन्द्रमुख्याश्चास्तुवन्तं प्रणमावहे ॥ ३६॥
हिंदी अर्थ: महर्षि असित और वत्सर ने कहा —
श्लोक २४: हे लम्बोदर! सदा योग-स्वरूप वाले आपको नमस्कार है। जिनका शरीर योग का साकार रूप है, जो योग-शांति प्रदान करने वाले हैं।
श्लोक २५: हे विघ्नेश! जो महाभक्तों के विघ्नों को हरने वाले हैं, और अभक्तों के लिए महाविघ्न उत्पन्न करने वाले हैं, आपको बारंबार नमस्कार है।
श्लोक २६: जो सदा अपने आनंद में निवास करते हैं, जो सदा स्वानंद प्रदान करने वाले हैं, जिनका वाहन मूषक है — हे मूषक-ध्वज! आपको नमस्कार है।
श्लोक २७: जो अनाथ (किसी के अधीन नहीं) हैं, फिर भी सबके नाथ-स्वरूप हैं, जो नाथों के भी नाथ-स्वरूप हैं — हे विनायक! आपको नमस्कार है।
श्लोक २८: जो सबकी माता और पिता दोनों रूप में हेरम्ब हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। हे ज्येष्ठराज! हे ज्येष्ठ! हे ज्येष्ठों के भी ज्येष्ठ! आपको नमस्कार है।
श्लोक २९: जो असीम हैं, जिनकी माप नहीं की जा सकती, जो अनंत क्रीड़ा करने वाले हैं, जो अनंत-अनंत रूपों वाले हैं, जो अनंतता प्रदान करने वाले हैं — आपको बारंबार नमस्कार है।
श्लोक ३०: हे सिद्धि-बुद्धि के स्वामी नाथ! भक्तों के रक्षक! नाना शक्तियों के पालनकर्ता, अनंत माया से क्रीड़ा करने वाले!
श्लोक ३१: हे गजवक्त्र! जो सबसे पहले पूज्य हैं, आपको नमस्कार है। जो सबके द्वारा पूज्य हैं, जो सबको सिद्धि प्रदान करने वाले हैं, आपको बारंबार नमस्कार है।
श्लोक ३२: हे वक्रतुण्ड! हे वीर! हे एकदन्त! आपको नमस्कार है। हे महोदर! हे देव! हे देवों के देवेश! आपको नमस्कार है।
श्लोक ३३: जो असुरों (भक्त बनने पर) के सहायक हैं, जो अनेक वरदान देने वाले हैं, तथा जो (दुष्ट) असुरों का नाश करने वाले हैं — हे आसुर-स्वरूप! आपको नमस्कार है।
श्लोक ३४: हे ब्राह्मणों के स्वामी! ब्राह्मणों को ब्रह्म-ज्ञान बताने वाले! ब्रह्म-स्वरूप! हे ढुण्ढि! वेदों द्वारा जानने योग्य आपको नमस्कार है।
श्लोक ३५: जो मन और वाणी से परे हैं, फिर भी जो मन और वाणी-स्वरूप हैं — हे योगेश्वर! हे परमेश्वर! हे समस्त रोगों से रहित!
श्लोक ३६: हे गणाधीश! हम आपकी क्या स्तुति करें, जिनकी स्तुति करके स्वयं वेद और योगींद्र भी शांति को प्राप्त होते हैं — हम केवल प्रणाम करते हैं।
कथा का समापन और फलश्रुति
एवं स्तुतो गणाधीशस्तौ जगाद महामुनी ।
वरं संवृणुतं विप्रौ दास्यामि भक्तियन्त्रितः ॥ ३७॥
भवद्भ्यां यत् कृतं स्तोत्रं तदेव मे प्रियं भवेत् ।
सर्वसिद्धिप्रदं पूर्णं तथा मद्भक्तिदायकम् ॥ ३८॥
इति असितवत्सरकृता लम्बोदरस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
हिंदी अर्थ: इस प्रकार स्तुति किए जाने पर गणाधीश ने उन दोनों महामुनियों से कहा — "हे विप्रो! वर मांगो, मैं भक्ति से बंधकर तुम्हें अवश्य दूंगा। तुम दोनों द्वारा रचित यह स्तोत्र मुझे प्रिय होगा। यह सर्वसिद्धि प्रदान करने वाला, सम्पूर्ण और मेरी भक्ति प्रदान करने वाला होगा।"
इस प्रकार यह असित-वत्सर द्वारा रचित लम्बोदर स्तुति सम्पूर्ण होती है।
इस स्तुति में गणेश जी के विरोधाभासी किंतु गहन स्वरूपों की व्याख्या
इस स्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें गणेश जी को बार-बार परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होने वाले किंतु गहन अर्थ रखने वाले विशेषणों से संबोधित किया गया है:
"अनाथाय...नाथरूपिणे": जो स्वयं किसी के अधीन नहीं (अनाथ नहीं, बल्कि स्वतंत्र), फिर भी सबके नाथ (स्वामी) हैं।
"हेरम्बाय...मात्रे पित्रे": जो एक साथ माता और पिता दोनों के रूप में विद्यमान हैं — यह उनके अद्वैत, पूर्ण स्वरूप को दर्शाता है।
"मनोवाणी विहीनाय...मनोवाणीमयाय": जो मन और वाणी से परे हैं, फिर भी मन और वाणी के ही रूप हैं — यह ठीक वैसा ही अद्वैत सिद्धांत है जो उपनिषदों में ब्रह्म के वर्णन में मिलता है।
"असुराणां सहायाय...असुराणां निहन्त्रे": जो असुरों के सहायक भी हैं (जब वे भक्त बनते हैं) और असुरों का नाश भी करते हैं (जब वे दुष्ट होते हैं) — यह दर्शाता है कि गणेश जी का न्याय कर्म पर आधारित है, न कि जन्म या वर्ग पर।
यह शैली ठीक वैसी ही है जैसी उपनिषदों में ब्रह्म को "अणोरणीयान् महतो महीयान्" (अणु से भी सूक्ष्म, महान से भी महान) कहा जाता है — अर्थात परमतत्त्व सभी विरोधाभासी गुणों को एक साथ धारण करता है।
लम्बोदर स्तोत्र पाठ की सही विधि
- समय: प्रातःकाल अथवा किसी गहन ध्यान-साधना के समय इस स्तुति का पाठ श्रेष्ठ माना जाता है।
- भाव: प्रत्येक विशेषण में छिपे गहन दार्शनिक अर्थ पर चिंतन करते हुए पाठ करें, न कि केवल शब्दों को दोहराते हुए।
- पूजन सामग्री: गणेश प्रतिमा के समक्ष दीप जलाकर, दूर्वा और मोदक अर्पित करते हुए इसका पाठ करना पारंपरिक विधि है।
- सर्वसिद्धि हेतु: स्वयं फलश्रुति में "सर्वसिद्धिप्रदं" कहा गया है, इसलिए किसी भी महत्वपूर्ण कार्य से पूर्व इसका पाठ शुभ माना जाता है।
यह स्तुति किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है
- सर्वांगीण सिद्धि हेतु: फलश्रुति के अनुसार यह "सर्वसिद्धिप्रदं पूर्णं" अर्थात सम्पूर्ण और सर्वसिद्धि प्रदान करने वाली स्तुति है।
- भक्ति-भाव गहरा करने हेतु: "मद्भक्तिदायकम्" के अनुसार यह गणेश-भक्ति को गहरा करने में विशेष सहायक है।
- योग-साधना हेतु: "योगरूपिणे", "योगशान्तिप्रदायिने" जैसे शब्द इसे योग-साधकों के लिए विशेष उपयुक्त बनाते हैं।
- दार्शनिक-आध्यात्मिक अध्ययन हेतु: इसमें छिपे अद्वैत सिद्धांत इसे गहन आध्यात्मिक अध्ययन के लिए भी उपयुक्त बनाते हैं।
जब स्वयं विधिवत पाठ करना संभव न हो
यदि आप सर्वांगीण सिद्धि, गहन भक्ति-भाव या योग-साधना में उन्नति चाहते हैं, तो 20 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाले ज्योतिषी प्रशांत दैवज्ञ से जुड़कर ऑनलाइन गणपति अनुष्ठान (लाइव वीडियो के माध्यम से) करवा सकते हैं। साथ ही, अपनी कुंडली में सिद्धि और साधना से जुड़े भावों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए मात्र ₹251 में उपलब्ध 35-पृष्ठ की विस्तृत ऑनलाइन जन्मकुंडली रिपोर्ट सहायक सिद्ध होगी।
निष्कर्ष
असितवत्सरकृता लम्बोदरस्तुतिः दो महर्षियों की संयुक्त भक्ति और गहन दार्शनिक अंतर्दृष्टि का सुंदर संगम है। इस स्तुति में गणेश जी को बार-बार परस्पर विरोधाभासी किंतु पूरक गुणों — अनाथ किंतु नाथ, माता किंतु पिता, वाणी-रहित किंतु वाणी-स्वरूप — के माध्यम से वर्णित किया गया है, जो उन्हें अद्वैत ब्रह्म के समकक्ष स्थापित करता है। जो साधक श्रद्धा और गहन चिंतन के साथ इस स्तुति का पाठ करता है, वह निश्चय ही सर्वसिद्धि, गहरी भक्ति और गणेश जी की पूर्ण कृपा प्राप्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: लम्बोदर स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है और किसने रचा है? यह स्तुति मुद्गल पुराण के पंचम खंड के दसवें अध्याय में वर्णित है, और इसकी रचना दो महर्षियों — असित और वत्सर — ने संयुक्त रूप से की है, इसीलिए इसे "असितवत्सरकृता लम्बोदरस्तुतिः" कहा जाता है।
प्रश्न 2: "लम्बोदर" नाम का गहरा अर्थ क्या है? "लम्बोदर" का शाब्दिक अर्थ बड़े उदर वाले हैं, परंतु दार्शनिक दृष्टि से यह दर्शाता है कि गणेश जी का उदर सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समेटे हुए है, जो उन्हें विराट पुरुष के समकक्ष स्थापित करता है।
प्रश्न 3: इस स्तुति की सबसे विशिष्ट काव्य-शैली क्या है? इस स्तुति की सबसे विशिष्ट शैली यह है कि इसमें गणेश जी को बार-बार परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होने वाले गुणों (जैसे अनाथ किंतु नाथ, माता किंतु पिता) के माध्यम से वर्णित किया गया है, जो अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों से मेल खाता है।
प्रश्न 4: इस स्तुति के पाठ से क्या लाभ मिलते हैं? फलश्रुति के अनुसार यह स्तुति सर्वसिद्धि, पूर्णता और गणेश-भक्ति प्रदान करने वाली है। स्वयं गणेश जी ने वचन दिया है कि यह स्तोत्र उन्हें प्रिय है और यह साधक को हर प्रकार की सिद्धि प्रदान करेगा।
प्रश्न 5: इस स्तुति का पाठ किनके लिए विशेष उपयुक्त है? यह स्तुति योग-साधकों, गहन आध्यात्मिक अध्ययन में रुचि रखने वालों, तथा सर्वांगीण सिद्धि और भक्ति की कामना रखने वाले सभी भक्तों के लिए उपयुक्त है।
अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।
लेखक: Admin
श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती
प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026
स्थिति: प्रकाशित
