
माँ अन्नपूर्णा और बाबा विश्वनाथ: जब स्वयं शिव ने भिक्षा माँगी
शिव ने माँ अन्नपूर्णा से भिक्षा क्यों माँगी? जानिए काशी की अन्नपूर्णा कथा, अन्नपूर्णा मंदिर का इतिहास, स्वर्ण प्रतिमा दर्शन, अन्नकूट, अन्नपूर्णा व्रत विधि, स्तोत्र और अन्न के सम्मान का संदेश।
Maa Annapurna and Baba Vishwanath: The Story of When Lord Shiva Himself Begged for Alms in Kashi
काशी में कोई भूखा नहीं सोता
काशी के बारे में एक प्रसिद्ध मान्यता है: "काशी में कोई भूखा नहीं सोता।"
इसका कारण हैं माँ अन्नपूर्णा, अन्न और पोषण की देवी, जो काशी में बाबा विश्वनाथ के बिल्कुल पास विराजमान हैं। काशी में शिव मोक्ष देते हैं, तो माँ अन्नपूर्णा अन्न। यानी काशी में भुक्ति (भोजन और भौतिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष), दोनों एक साथ मिलते हैं।
इस परंपरा के पीछे एक अद्भुत कथा है: एक समय ऐसा भी आया जब स्वयं भगवान शिव को हाथ में भिक्षा-पात्र लेकर माँ अन्नपूर्णा के द्वार पर भिक्षा माँगनी पड़ी।
इस लेख में हम जानेंगे:
- माँ अन्नपूर्णा कौन हैं
- शिव द्वारा भिक्षा माँगने की पौराणिक कथा
- काशी का अन्नपूर्णा मंदिर और उसका इतिहास
- स्वर्ण अन्नपूर्णा दर्शन और अन्नकूट उत्सव
- कनाडा से लौटी अन्नपूर्णा प्रतिमा की कहानी
- अन्नपूर्णा व्रत और पूजा विधि
- अन्नपूर्णा स्तोत्र और मंत्र
- अन्न के सम्मान का जीवन-संदेश और FAQ
भाग 1: माँ अन्नपूर्णा कौन हैं?
1.1 नाम का अर्थ
- अन्न = भोजन, पोषण
- पूर्णा = पूर्ण करने वाली, भरपूर
- अन्नपूर्णा = जो अन्न से भरपूर हैं और सबको भोजन देकर तृप्त करती हैं।
1.2 स्वरूप
- माँ अन्नपूर्णा को माता पार्वती का ही एक रूप माना जाता है।
- उनके हाथों में अन्न से भरा पात्र और करछुल (कलछी/दर्वी) दिखाया जाता है।
- वे रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान और अत्यंत सौम्य रूप में वर्णित हैं।
- कई चित्रों में शिव भिक्षु रूप में उनके सामने भिक्षा-पात्र लिए खड़े दिखाए जाते हैं।
1.3 अन्नपूर्णा का महत्व
- भारतीय परंपरा में अन्न को ब्रह्म कहा गया है: "अन्नं ब्रह्म"।
- भोजन केवल पेट भरने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन देने वाली दिव्य शक्ति है।
- अन्नपूर्णा उसी दिव्य शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं।
- भारतीय घरों में रसोई को माँ अन्नपूर्णा का स्थान माना जाता है।
भाग 2: जब शिव ने भिक्षा माँगी: पौराणिक कथा
यह कथा लोक परंपरा और कई पौराणिक प्रसंगों में अलग-अलग रूपों में सुनाई जाती है। इसका सबसे प्रचलित रूप इस प्रकार है:
2.1 शिव-पार्वती का संवाद
- एक दिन कैलाश पर भगवान शिव और माता पार्वती के बीच संसार के स्वरूप पर चर्चा हुई।
- शिव ने कहा कि यह संसार माया है: सब कुछ नश्वर और भ्रम है। अन्न भी माया है; असली सत्य तो केवल आत्मा है।
- माता पार्वती को यह बात उचित नहीं लगी। वे प्रकृति और शक्ति का स्वरूप हैं, और अन्न उन्हीं की देन है।
- उन्होंने विचार किया कि शिव को अन्न के महत्व का अनुभव कराना आवश्यक है।
2.2 पार्वती का अंतर्धान होना
- माता पार्वती अदृश्य (अंतर्धान) हो गईं।
- शक्ति के अंतर्धान होते ही पूरी सृष्टि में अन्न समाप्त हो गया।
- धरती बंजर हो गई, खेत सूख गए, और चारों ओर अकाल पड़ गया।
- देवता, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी, सब भूख से व्याकुल हो गए।
2.3 शिव को भूख का अनुभव
- स्वयं भगवान शिव और उनके गणों को भी भूख लगने लगी।
- तब शिव को समझ आया कि अन्न को "माया" कहकर नकारा नहीं जा सकता। शरीर है, तो अन्न भी आवश्यक है।
2.4 काशी में अन्नपूर्णा का प्रकट होना
- उसी समय पता चला कि पूरी सृष्टि में केवल एक स्थान पर रसोई जल रही है: काशी।
- माता पार्वती काशी में अन्नपूर्णा के रूप में प्रकट हुई थीं और सबको भोजन करा रही थीं।
- भगवान शिव भिक्षु का रूप धारण करके, हाथ में कपाल/भिक्षा-पात्र लेकर काशी पहुँचे।
- उन्होंने माँ अन्नपूर्णा के द्वार पर खड़े होकर कहा: "भिक्षां देहि" (भिक्षा दीजिए)।
2.5 माँ अन्नपूर्णा का दान
- माँ अन्नपूर्णा ने प्रेमपूर्वक अपनी करछुल से शिव के पात्र में अन्न डाला।
- शिव ने वह अन्न ग्रहण किया और फिर उसे संसार के सभी प्राणियों में बाँट दिया।
- सृष्टि में फिर से अन्न और समृद्धि लौट आई।
- शिव ने स्वीकार किया कि शिव (चेतना) और शक्ति (प्रकृति), दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
2.6 काशी में स्थायी निवास
- मान्यता है कि इसके बाद माँ अन्नपूर्णा ने काशी में स्थायी रूप से निवास करना स्वीकार किया।
- शिव ने काशी को मोक्ष का वरदान दिया, और अन्नपूर्णा ने काशी को अन्न का वरदान।
- तभी से माना जाता है कि काशी में कोई भूखा नहीं सोता।
नोट: इस कथा के कई रूप प्रचलित हैं। कुछ कथाओं में शिव द्वारा भिक्षा माँगने को ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति से भी जोड़ा जाता है। मूल भाव सभी में एक ही है: अन्न के महत्व और शिव-शक्ति की एकता का संदेश।
भाग 3: कथा में छिपे गहरे संदेश
3.1 आध्यात्म और भौतिकता का संतुलन
- शिव वैराग्य और आत्मज्ञान के प्रतीक हैं, और अन्नपूर्णा प्रकृति और पोषण की।
- कथा सिखाती है कि केवल आध्यात्म या केवल भौतिकता नहीं, दोनों का संतुलन ज़रूरी है।
- भूखे पेट भजन नहीं होता, यह लोक कहावत इसी सत्य को बताती है।
3.2 शिव-शक्ति की एकता
- शक्ति के बिना शिव अपूर्ण हैं, और शिव के बिना शक्ति।
- अर्धनारीश्वर रूप की तरह यह कथा भी दोनों की अविभाज्यता दिखाती है।
3.3 अहंकार का त्याग
- सृष्टि के स्वामी महादेव भी भिक्षु बनकर द्वार पर खड़े हुए।
- संदेश: आवश्यकता के समय विनम्र होकर माँगना लज्जा नहीं, बल्कि अहंकार का त्याग है।
3.4 अन्न का सम्मान
- अन्न को तुच्छ समझने का परिणाम अकाल है।
- संदेश: अन्न की बर्बादी करना माँ अन्नपूर्णा का अपमान है।
3.5 बाँटने की संस्कृति
- शिव ने प्राप्त अन्न स्वयं नहीं रखा, बल्कि सबमें बाँट दिया।
- संदेश: जो मिला है उसे बाँटना ही सच्चा धर्म है। यही भंडारे और लंगर की परंपरा का मूल भाव है।
भाग 4: काशी का अन्नपूर्णा मंदिर
4.1 स्थान
- माँ अन्नपूर्णा का मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर के बहुत पास स्थित है।
- श्रद्धालु सामान्यतः विश्वनाथ दर्शन के साथ ही अन्नपूर्णा दर्शन भी करते हैं।
- मान्यता है कि विश्वनाथ दर्शन के बाद अन्नपूर्णा दर्शन से यात्रा का फल पूर्ण होता है।
4.2 इतिहास
- वर्तमान मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में मराठा शासन काल से जोड़ा जाता है। परंपरागत रूप से इसका श्रेय पेशवा से जोड़ा जाता है।
- मंदिर की वास्तुकला में उत्तर भारतीय मंदिर शैली दिखाई देती है।
- मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी हैं।
4.3 दैनिक दर्शन
- मंदिर में प्रतिदिन माँ अन्नपूर्णा की सामान्य प्रतिमा के दर्शन होते हैं।
- सुबह और शाम आरती होती है।
- मंदिर की ओर से अन्न क्षेत्र/भोजन सेवा की परंपरा भी रही है।
नोट: दर्शन का समय, भोजन सेवा और व्यवस्था बदल सकती है। जाने से पहले स्थानीय जानकारी लें।
भाग 5: स्वर्ण अन्नपूर्णा दर्शन और अन्नकूट उत्सव
5.1 स्वर्ण प्रतिमा
- अन्नपूर्णा मंदिर में माँ की एक स्वर्ण (सोने की) प्रतिमा भी है।
- यह प्रतिमा साल में केवल कुछ दिन ही दर्शन के लिए खोली जाती है।
- परंपरागत रूप से ये दिन धनतेरस से अन्नकूट (दीपावली के आसपास) के बीच होते हैं।
- इन दिनों मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है, और श्रद्धालु घंटों कतार में लगकर दर्शन करते हैं।
5.2 "खज़ाना" वितरण
- स्वर्ण अन्नपूर्णा दर्शन के दिनों में मंदिर की ओर से भक्तों को "खज़ाना" दिया जाता है, जिसमें प्रसाद के रूप में सिक्के और अन्न (धान/चावल) होते हैं।
- मान्यता है कि यह खज़ाना घर की तिजोरी या अन्न-भंडार में रखने से साल भर धन-धान्य की कमी नहीं होती।
- कई परिवार इसे पीढ़ियों से अपनी परंपरा के रूप में लेते आ रहे हैं।
5.3 अन्नकूट
- अन्नकूट का अर्थ है अन्न का पर्वत।
- दीपावली के अगले दिन (गोवर्धन पूजा के आसपास) मंदिर में अनेक प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।
- काशी विश्वनाथ मंदिर सहित कई मंदिरों में भी अन्नकूट का भव्य श्रृंगार होता है।
- बाद में यह भोग प्रसाद के रूप में भक्तों में बाँटा जाता है।
नोट: स्वर्ण प्रतिमा दर्शन की तिथियाँ और व्यवस्था हर वर्ष पंचांग और मंदिर प्रबंधन के अनुसार तय होती हैं। आधिकारिक सूचना अवश्य देखें।
भाग 6: कनाडा से लौटी माँ अन्नपूर्णा की प्रतिमा
यह आधुनिक समय की एक भावुक कहानी है, जो काशी और अन्नपूर्णा से जुड़ी है:
- माँ अन्नपूर्णा की एक प्राचीन पत्थर की प्रतिमा लगभग एक सदी पहले (20वीं सदी की शुरुआत में) काशी से चोरी होकर विदेश पहुँच गई थी।
- यह प्रतिमा कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ़ रेजाइना के एक संग्रह में थी।
- लंबे प्रयासों के बाद यह प्रतिमा भारत को लौटाई गई।
- नवंबर 2021 में इसे विधि-विधान के साथ काशी विश्वनाथ धाम परिसर में पुनर्स्थापित किया गया।
- यह घटना इस बात का प्रतीक बनी कि काशी की देवी अपने घर लौट आईं।
- श्रद्धालु अब काशी विश्वनाथ धाम परिसर में इस प्रतिमा के भी दर्शन कर सकते हैं।
भाग 7: अन्नपूर्णा व्रत और पूजा विधि
अस्वीकरण: व्रत के नियम क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं। स्वास्थ्य समस्या हो तो व्रत से पहले डॉक्टर की सलाह लें।
7.1 अन्नपूर्णा व्रत कब?
- परंपरा में मार्गशीर्ष (अगहन) मास में अन्नपूर्णा व्रत का विशेष महत्व है।
- कई क्षेत्रों में यह व्रत 17 दिन तक रखा जाता है, और इसमें 17 गाँठ वाला धागा धारण करने की परंपरा है।
- अन्नपूर्णा जयंती मार्गशीर्ष पूर्णिमा को मनाई जाती है।
- सामान्य रूप से शुक्रवार को भी माँ अन्नपूर्णा की पूजा शुभ मानी जाती है।
7.2 पूजन सामग्री
- माँ अन्नपूर्णा का चित्र या प्रतिमा
- अन्न (चावल, गेहूँ या धान)
- 17 गाँठ वाला धागा (17 दिन के व्रत के लिए)
- कलश, नारियल, आम के पत्ते
- रोली, चंदन, अक्षत, हल्दी
- पुष्प, माला
- धूप, दीप (घी का), कपूर
- नैवेद्य: खीर, हलवा, पूरी या घर में बना सात्विक भोजन
7.3 पूजा विधि (सरल क्रम)
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- रसोई को विशेष रूप से साफ़ करें, क्योंकि यह माँ अन्नपूर्णा का स्थान है।
- पूजा स्थान या रसोई में चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएँ।
- माँ अन्नपूर्णा का चित्र स्थापित करें और सामने अन्न की ढेरी रखें।
- कलश स्थापना और गणेश पूजन करें।
- माँ को रोली, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
- अन्नपूर्णा स्तोत्र या मंत्र का पाठ करें।
- व्रत कथा सुनें।
- आरती करें और प्रसाद बाँटें।
- 17 दिन के व्रत में धागा धारण करें और अंतिम दिन विधिपूर्वक उद्यापन करें।
7.4 व्रत में क्या करें?
- व्रत अपनी क्षमता के अनुसार एक समय भोजन या फलाहार के रूप में रखा जा सकता है।
- भोजन दान करें: किसी भूखे, ज़रूरतमंद या गाय को भोजन अवश्य कराएँ।
- अन्न की बर्बादी बिल्कुल न करें।
भाग 8: अन्नपूर्णा स्तोत्र और मंत्र
8.1 अन्नपूर्णा स्तोत्र
- आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाने वाला अन्नपूर्णा स्तोत्र अत्यंत प्रसिद्ध है।
- इसके हर श्लोक का अंत इस पंक्ति से होता है:
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी॥ अर्थ: हे कृपा का सहारा देने वाली माँ अन्नपूर्णेश्वरी, मुझे भिक्षा दीजिए।
- इस स्तोत्र में शंकराचार्य स्वयं को एक भिक्षुक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कथा में शिव।
- स्तोत्र के अंतिम भाग में माँ से ज्ञान और वैराग्य की भिक्षा माँगी गई है। यानी अन्न के साथ आत्मिक पोषण की भी प्रार्थना।
8.2 सरल मंत्र
- "ॐ अन्नपूर्णायै नमः": सरल नाम मंत्र
- "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि अन्नपूर्णे स्वाहा": परंपरा में प्रचलित अन्नपूर्णा मंत्र
8.3 भोजन से पहले प्रार्थना
भारतीय परंपरा में भोजन से पहले अन्न को नमन करने की परंपरा है। गीता का यह श्लोक भोजन मंत्र के रूप में प्रसिद्ध है:
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
- इसका भाव है कि भोजन, भोजन करने वाला और भोजन की क्रिया, सब ब्रह्म है।
- भोजन से पहले माँ अन्नपूर्णा का स्मरण करना कृतज्ञता का सुंदर अभ्यास है।
भाग 9: ज्योतिषीय और वास्तु दृष्टि
अस्वीकरण: ये बातें धार्मिक, ज्योतिषीय और वास्तु मान्यताओं पर आधारित हैं। व्यक्तिगत समस्या के लिए योग्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।
9.1 धन-धान्य की वृद्धि
- मान्यता है कि माँ अन्नपूर्णा की पूजा से घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती।
- शुक्र ग्रह को भोग, सुख और समृद्धि से जोड़ा जाता है। इसलिए शुक्रवार की अन्नपूर्णा पूजा को विशेष माना जाता है।
9.2 रसोई और वास्तु
- वास्तु परंपरा में रसोई को अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व) में उत्तम माना जाता है।
- रसोई में माँ अन्नपूर्णा का चित्र लगाना शुभ माना जाता है।
- रसोई को साफ़-सुथरा रखना और रात में जूठे बर्तन न छोड़ना परंपरा में शुभ बताया गया है।
- पहली रोटी गाय के लिए और अंतिम रोटी कुत्ते के लिए निकालने की परंपरा कई घरों में है।
9.3 अन्न का अनादर = दरिद्रता
- लोक मान्यता है कि अन्न फेंकना, थाली में जूठन छोड़ना और भोजन का अपमान करना दरिद्रता लाता है।
- यह मान्यता एक व्यावहारिक सीख भी है: भोजन की बर्बादी से बचना।
भाग 10: आधुनिक जीवन में अन्नपूर्णा का संदेश
10.1 भोजन की बर्बादी रोकें
- आज दुनिया भर में बड़ी मात्रा में भोजन बर्बाद होता है, जबकि करोड़ों लोग भूखे सोते हैं।
- माँ अन्नपूर्णा की कथा हमें याद दिलाती है कि अन्न को तुच्छ समझने का परिणाम अकाल है।
- थाली में उतना ही लें जितना खा सकें।
- शादी-ब्याह और आयोजनों में बचा हुआ भोजन ज़रूरतमंदों तक पहुँचाएँ।
10.2 किसान का सम्मान
- अन्न हमारी थाली तक किसान की मेहनत से पहुँचता है।
- अन्नपूर्णा की पूजा का एक अर्थ है अन्नदाता किसान का सम्मान।
10.3 भंडारे और लंगर की परंपरा
- भारत में भंडारा, लंगर, अन्नक्षेत्र और प्रसाद वितरण की परंपरा इसी भाव से जुड़ी है।
- "अन्नदान महादान": अन्नदान को सबसे बड़ा दान माना गया है, क्योंकि यह तुरंत तृप्ति देता है।
10.4 माँ के हाथ का भोजन
- हर घर में माँ एक अन्नपूर्णा हैं, जो बिना थके सबको भोजन कराती हैं।
- अन्नपूर्णा की पूजा का एक सुंदर अर्थ है घर की अन्नपूर्णाओं का आदर और उनके श्रम में हाथ बँटाना।
भाग 11: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: शिव ने माँ अन्नपूर्णा से भिक्षा क्यों माँगी? उत्तर: कथा के अनुसार शिव ने अन्न को माया कहा, तो पार्वती अंतर्धान हो गईं और सृष्टि में अकाल पड़ गया। तब शिव ने काशी में अन्नपूर्णा रूप में प्रकट पार्वती से भिक्षा माँगी, और अन्न का महत्व स्वीकार किया।
प्रश्न 2: काशी में अन्नपूर्णा मंदिर कहाँ है? उत्तर: काशी विश्वनाथ मंदिर के बहुत पास। श्रद्धालु सामान्यतः विश्वनाथ दर्शन के साथ ही अन्नपूर्णा दर्शन करते हैं।
प्रश्न 3: स्वर्ण अन्नपूर्णा के दर्शन कब होते हैं? उत्तर: परंपरागत रूप से धनतेरस से अन्नकूट (दीपावली के आसपास) तक के कुछ दिनों में। सटीक तिथियों के लिए मंदिर की आधिकारिक सूचना देखें।
प्रश्न 4: अन्नपूर्णा मंदिर का "खज़ाना" क्या है? उत्तर: स्वर्ण अन्नपूर्णा दर्शन के दिनों में भक्तों को प्रसाद के रूप में सिक्के और अन्न दिए जाते हैं। मान्यता है कि इसे घर में रखने से धन-धान्य की कमी नहीं होती।
प्रश्न 5: कनाडा से लौटी अन्नपूर्णा प्रतिमा कहाँ है? उत्तर: लगभग एक सदी पहले चोरी हुई यह प्रतिमा कनाडा से लौटाई गई और नवंबर 2021 में काशी विश्वनाथ धाम परिसर में पुनर्स्थापित की गई।
प्रश्न 6: अन्नपूर्णा व्रत कब और कैसे करें? उत्तर: परंपरा में मार्गशीर्ष मास में 17 दिन का अन्नपूर्णा व्रत प्रचलित है, जिसमें 17 गाँठ वाला धागा धारण किया जाता है। शुक्रवार को भी पूजा शुभ मानी जाती है।
प्रश्न 7: अन्नपूर्णा स्तोत्र किसने लिखा? उत्तर: परंपरागत रूप से इसे आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है।
प्रश्न 8: घर में माँ अन्नपूर्णा को प्रसन्न कैसे रखें? उत्तर: रसोई को साफ़ रखें, अन्न की बर्बादी न करें, भोजन से पहले कृतज्ञता व्यक्त करें, और अन्नदान करें।
प्रश्न 9: "काशी में कोई भूखा नहीं सोता" का क्या अर्थ है? उत्तर: यह मान्यता है कि माँ अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से काशी में हर प्राणी को भोजन मिलता है। काशी की भंडारा और अन्नक्षेत्र परंपरा इसी भाव से जुड़ी है।
निष्कर्ष: भुक्ति और मुक्ति की नगरी
काशी की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि यहाँ बाबा विश्वनाथ मुक्ति देते हैं और माँ अन्नपूर्णा भुक्ति। शरीर के पोषण और आत्मा की मुक्ति, दोनों एक ही नगरी में, एक-दूसरे के बिल्कुल पास।
शिव द्वारा भिक्षा माँगने की कथा हमें सिखाती है:
- अन्न ईश्वर का प्रसाद है; उसका अपमान न करें।
- आध्यात्म और जीवन की ज़रूरतें, दोनों का संतुलन आवश्यक है।
- शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
- जो मिला है, उसे बाँटना ही सच्चा धर्म है।
जब भी आप भोजन की थाली के सामने बैठें, एक पल के लिए माँ अन्नपूर्णा को याद करें और कहें: "माँ, आपका धन्यवाद।"
॥ जय माँ अन्नपूर्णा ॥ हर हर महादेव ॥
अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी पौराणिक कथाओं, धार्मिक मान्यताओं, लोक परंपराओं और सामान्य ज्योतिषीय/वास्तु मान्यताओं पर आधारित है। मंदिर का समय, स्वर्ण प्रतिमा दर्शन की तिथियाँ और व्यवस्था बदल सकती हैं। नवीनतम जानकारी के लिए आधिकारिक स्रोत देखें।
लेखक: Admin
श्रेणी: पूजा और तीर्थ
प्रकाशन तिथि: 27 सितंबर 2026
स्थिति: प्रकाशित
