
मयूरेश स्तोत्रम्: मोर पर सवार गणेश के उस स्वरूप की स्तुति जो कारागार से भी मुक्ति दिलाता है
ब्रह्मा जी द्वारा रचित मयूरेश स्तोत्रम् का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और महत्व जानें। अष्टविनायक के प्रथम स्थान मोरगांव के मयूरेश्वर को समर्पित यह स्तोत्र कारागार-मुक्ति तक प्रदान करता है।
Mayureshwar Stotram: Praise of the Peacock-Mounted Ganesha Who Grants Release Even From Prison
अष्टविनायक यात्रा का पहला और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव
महाराष्ट्र में गणेश-भक्ति की एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र परंपरा है — अष्टविनायक यात्रा, जिसमें आठ प्रसिद्ध गणेश मंदिरों के दर्शन किए जाते हैं। इस पूरी यात्रा का आरंभ और सबसे महत्वपूर्ण स्थान है मोरगांव (पुणे के निकट), जहां भगवान गणेश मयूरेश्वर के रूप में विराजमान हैं — अर्थात मोर (मयूर) पर सवार गणेश। यही कारण है कि इस क्षेत्र को अष्टविनायक यात्रा का प्रथम और सबसे आवश्यक पड़ाव माना जाता है, और इनके बिना यह यात्रा अधूरी समझी जाती है।
मयूरेश स्तोत्रम् इसी दिव्य स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसकी रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने की थी। यह स्तोत्र दस श्लोकों में गणेश जी के परब्रह्म-स्वरूप का वर्णन करता है, और इसके अंत में स्वयं मयूरेश्वर द्वारा दी गई फलश्रुति में एक अत्यंत असाधारण वरदान का उल्लेख मिलता है — कारागार से मुक्ति।
मयूरेश्वर कौन हैं और "मोर" का प्रतीकात्मक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में जब सिंधु नामक असुर ने पृथ्वी पर उत्पात मचाया, तब भगवान गणेश ने मोर की सवारी करके उसका वध किया, और तभी से वे "मयूरेश्वर" (मयूर के स्वामी/मोर पर सवार ईश्वर) कहलाए। मोर को शास्त्रों में अहंकार और चंचलता पर विजय का प्रतीक माना जाता है — क्योंकि मोर अपने सुंदर पंखों पर गर्व करता है, फिर भी वह गणेश जी के वाहन के रूप में पूर्ण समर्पण में रहता है। यह दर्शाता है कि गणेश जी की कृपा से सबसे बड़ा अहंकार भी विनम्रता में बदल जाता है।
मयूरेश स्तोत्रम् — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित
ब्रह्मोवाच ।
पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा ।
मायाविनं दुर्विभाग्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ १॥
परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदिस्थितम् ।
गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ २॥
सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया ।
सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ३॥
नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् ।
नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ४॥
इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् ।
सदसद्वक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ५॥
सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् ।
सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ६॥
पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् ।
भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ७॥
मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम् ।
समष्टिव्यष्टिरूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ८॥
सर्वज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् ।
सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ९॥
अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम् ।
अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ १०॥
हिंदी अर्थ: ब्रह्मा जी ने कहा —
श्लोक १: जो पुराण-पुरुष हैं, जो प्रसन्नतापूर्वक अनेक लीलाएं करने वाले हैं, जो मायावी (अलौकिक शक्ति से युक्त) हैं, जो दुष्टों के लिए दुर्भाग्य-स्वरूप हैं — उन मयूरेश को मैं नमन करता हूं।
श्लोक २: जो परात्पर (सर्वोच्च) हैं, चिदानंद-स्वरूप हैं, निर्विकार हैं, जो हृदय में स्थित हैं, जो गुणों से परे होते हुए भी गुणमय हैं — उन मयूरेश को मैं नमन करता हूं।
श्लोक ३: जो अपनी इच्छा से सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, जो सम्पूर्ण विघ्नों को हरने वाले देव हैं — उन मयूरेश को मैं नमन करता हूं।
श्लोक ४: जो अनेक दैत्यों का नाश करने वाले हैं, जो अनेक रूप धारण करते हैं, जो भक्तिपूर्वक अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले हैं — उन मयूरेश को मैं नमन करता हूं।
श्लोक ५: जिनकी स्तुति इंद्र आदि देवगण दिन-रात करते हैं, जो सत्-असत् दोनों के वक्ता हैं, फिर भी जो अव्यक्त हैं — उन मयूरेश को मैं नमन करता हूं।
श्लोक ६: जो सर्वशक्तिमय देव हैं, जो सभी रूप धारण करने वाले सर्वव्यापी प्रभु हैं, जो समस्त विद्याओं के प्रवक्ता हैं — उन मयूरेश को मैं नमन करता हूं।
श्लोक ७: जो पार्वती के नंदन (पुत्र) हैं, जो शिव के आनंद को बढ़ाने वाले हैं, जो नित्य भक्तों को आनंद प्रदान करने वाले हैं — उन मयूरेश को मैं नमन करता हूं।
श्लोक ८: जो मुनियों द्वारा ध्यान किए जाने योग्य हैं, जो मुनियों द्वारा स्तुत हैं, जो मुनियों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, जो समष्टि (सम्पूर्ण) और व्यष्टि (व्यक्तिगत) — दोनों रूपों में विद्यमान हैं — हे मयूरेश! मैं आपको नमन करता हूं।
श्लोक ९: जो समस्त अज्ञान का नाश करने वाले हैं, जो समस्त ज्ञान प्रदान करने वाले हैं, जो शुद्ध हैं, जो सत्य-ज्ञान-स्वरूप और सत्य हैं — उन मयूरेश को मैं नमन करता हूं।
श्लोक १०: जो अनेक करोड़ ब्रह्मांडों के नायक हैं, जो जगत के ईश्वर हैं, जो अनंत ऐश्वर्य से युक्त साक्षात विष्णु-स्वरूप हैं — उन मयूरेश को मैं नमन करता हूं।
फलश्रुति — स्वयं मयूरेश्वर का वरदान
मयूरेश उवाच ।
इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रनाशनम् ।
कारागृहगतानां च मोचनं दिनसप्तकात् ॥ ११॥
आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ॥ १२॥
इति मयूरेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
हिंदी अर्थ: मयूरेश ने कहा — यह ब्रह्मा द्वारा रचित स्तोत्र समस्त पापों का नाश करने वाला है। कारागार में बंद व्यक्तियों को भी यह सात दिनों के भीतर मुक्ति दिलाने वाला है। यह मानसिक चिंता (आधि) और शारीरिक व्याधि (रोग) दोनों को हरने वाला है, तथा भुक्ति (भौतिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाला शुभ स्तोत्र है।
इस प्रकार यह मयूरेश स्तोत्र सम्पूर्ण होता है।
स्तोत्र में वर्णित मयूरेश्वर के परब्रह्म-स्वरूप की गहराई
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मयूरेश्वर को केवल एक स्थानीय देवता या मंदिर-मूर्ति तक सीमित न रखकर, उन्हें साक्षात परब्रह्म, विष्णु-स्वरूप और सम्पूर्ण ब्रह्मांडों के नायक के रूप में स्थापित करता है — "अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम्, अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम्"। यह दर्शाता है कि भले ही मयूरेश्वर का प्राकट्य एक विशेष स्थान (मोरगांव) से जुड़ा हो, परंतु उनका वास्तविक स्वरूप सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है।
साथ ही, "समष्टिव्यष्टिरूपं" जैसे शब्द वेदांत के इस सिद्धांत को दर्शाते हैं कि गणेश जी एक साथ समष्टि (सम्पूर्ण ब्रह्मांड) और व्यष्टि (प्रत्येक व्यक्तिगत जीव) दोनों रूपों में विद्यमान हैं — यह अद्वैत दर्शन की एक गहरी अभिव्यक्ति है।
"कारागृहगतानां मोचनम्" — इस स्तोत्र की सबसे असाधारण विशेषता
अधिकांश गणेश स्तोत्र विघ्न-नाश, धन-प्राप्ति या विद्या-प्राप्ति का वरदान देते हैं, परंतु मयूरेश स्तोत्र में एक अत्यंत विशिष्ट और दुर्लभ वरदान का उल्लेख है — जो व्यक्ति कारागार (जेल) में बंद हो, वह भी इस स्तोत्र के श्रद्धापूर्ण पाठ से सात दिनों के भीतर मुक्त हो सकता है। यह वरदान इस स्तोत्र को विशेष रूप से न्यायिक विवादों, झूठे आरोपों या कानूनी उलझनों में फंसे लोगों के लिए अत्यंत प्रासंगिक बनाता है।
मयूरेश स्तोत्र पाठ की सही विधि
- समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात, अथवा किसी कानूनी या न्यायिक समस्या के समाधान के लिए विशेष रूप से इसका पाठ किया जाता है।
- निरंतरता: फलश्रुति में "दिनसप्तकात्" अर्थात सात दिनों का उल्लेख है, इसलिए इसे लगातार सात दिनों तक श्रद्धापूर्वक पढ़ने की परंपरा है।
- पूजन सामग्री: गणेश प्रतिमा (विशेषकर मयूर-वाहन सहित चित्र या मूर्ति) के समक्ष दीप जलाकर, मोरपंख अर्पित करके इसका पाठ करना विशेष शुभ माना जाता है।
- मानसिक और शारीरिक कष्ट में: "आधिव्याधिहरं" के अनुसार यह मानसिक चिंता और शारीरिक रोग दोनों की स्थिति में भी पढ़ा जा सकता है।
- मोरगांव यात्रा के साथ: यदि संभव हो, तो मोरगांव स्थित मयूरेश्वर मंदिर की यात्रा के दौरान इस स्तोत्र का पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।
यह स्तोत्र किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है
- कानूनी विवाद और कारागार से मुक्ति हेतु: इसका सबसे विशिष्ट और दुर्लभ वरदान यही है — झूठे आरोप, अन्यायपूर्ण बंदी या कानूनी उलझनों में विशेष सहायक।
- मानसिक चिंता और रोग में: "आधिव्याधिहरं" के अनुसार मानसिक तनाव और शारीरिक व्याधि दोनों में राहत देने वाला।
- पाप-मुक्ति हेतु: "सर्वपापप्रनाशनम्" के अनुसार यह पूर्वकृत पापों के प्रभाव से मुक्ति दिलाने में सहायक है।
- सर्वांगीण सुख-मोक्ष हेतु: "भुक्तिमुक्तिप्रदं" के अनुसार यह भौतिक सुख और आध्यात्मिक मोक्ष — दोनों एक साथ प्रदान करता है।
जब स्वयं विधिवत पाठ करना संभव न हो
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निष्कर्ष
मयूरेश स्तोत्रम् अष्टविनायक परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण स्थान — मोरगांव के मयूरेश्वर — को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा रचित यह स्तोत्र गणेश जी को साक्षात परब्रह्म और विष्णु-स्वरूप के रूप में स्थापित करता है, और इसकी फलश्रुति में वर्णित "कारागार-मुक्ति" जैसा दुर्लभ वरदान इसे अन्य स्तोत्रों से विशिष्ट बनाता है। जो साधक श्रद्धापूर्वक सात दिनों तक इसका पाठ करता है, वह पाप, रोग, चिंता और अन्यायपूर्ण बंधनों से मुक्त होकर भुक्ति और मुक्ति — दोनों प्राप्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: मयूरेश्वर कौन हैं और वे किस स्थान से जुड़े हैं? मयूरेश्वर भगवान गणेश का मोर (मयूर) पर सवार स्वरूप है, जो महाराष्ट्र के मोरगांव (पुणे के निकट) में विराजमान हैं। यह अष्टविनायक यात्रा का प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।
प्रश्न 2: मयूरेश स्तोत्र किसने रचा है? इस स्तोत्र की रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने की है ("ब्रह्मोवाच"), और इसके अंत में स्वयं मयूरेश्वर द्वारा दी गई फलश्रुति ("मयूरेश उवाच") भी सम्मिलित है, जो इसे विशेष प्रामाणिकता प्रदान करती है।
प्रश्न 3: इस स्तोत्र की सबसे विशिष्ट फलश्रुति क्या है? इस स्तोत्र की सबसे असाधारण विशेषता यह है कि यह कारागार में बंद व्यक्ति को भी सात दिनों के भीतर मुक्ति दिलाने की क्षमता रखता है, जो अन्य अधिकांश गणेश स्तोत्रों में नहीं मिलती।
प्रश्न 4: इस स्तोत्र का पाठ कैसे और कितने दिनों तक करना चाहिए? फलश्रुति में "दिनसप्तकात्" अर्थात सात दिनों का उल्लेख है, इसलिए इसे लगातार सात दिनों तक प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक पढ़ने की परंपरा है, विशेषकर किसी कानूनी या गंभीर समस्या के समाधान हेतु।
प्रश्न 5: क्या यह स्तोत्र केवल कानूनी समस्याओं के लिए ही उपयुक्त है? नहीं, फलश्रुति के अनुसार यह पाप-नाश, मानसिक चिंता और शारीरिक रोग-निवारण में भी सहायक है, तथा भुक्ति (भौतिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाला सम्पूर्ण स्तोत्र है।
अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।
लेखक: Admin
श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती
प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026
स्थिति: प्रकाशित
