
मूषकवाहन स्तोत्रम्: छोटे से मूषक पर सवार गणेश के विराट स्वरूप का सजीव चित्रण
मूषिकवाहनशतनामस्तोत्रम् का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और महत्व जानें। मूषक-वाहन गणेश के विराट, रौद्र और वात्सल्यपूर्ण — तीनों स्वरूपों का सजीव चित्रण करने वाला यह स्तोत्र।
Mushakavahana Stotram: A Vivid Portrait of Ganesha's Vast Form on a Tiny Mouse
सबसे छोटे वाहन पर विराजमान सबसे विराट देवता
भगवान गणेश की सबसे विशिष्ट पहचान में से एक है उनका वाहन — मूषक (चूहा)। यह दृश्य अपने आप में एक गहरा प्रतीक है: संसार का सबसे विशाल शरीर वाला देवता, सबसे छोटे प्राणी की सवारी करता है। यह दर्शाता है कि गणेश जी के लिए आकार, शक्ति और सीमाएं कोई मायने नहीं रखतीं — वे इच्छानुसार किसी भी छोटे साधन को भी अपनी विराटता का वाहक बना सकते हैं।
इसी मूषक-वाहन स्वरूप को समर्पित मूषिकवाहनशतनामस्तोत्रम् एक अत्यंत सजीव और चित्रात्मक स्तोत्र है, जो अठारह श्लोकों में गणेश जी के रूप, आभूषण, स्वभाव और शक्ति का इतना विस्तृत वर्णन करता है कि पढ़ते समय मानो उनकी सम्पूर्ण प्रतिमा आंखों के सामने साकार हो उठती है।
मूषिकवाहनशतनामस्तोत्रम् — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित
मूषिकवाहन मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बितसूत्र ।
वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायकपाद नमस्ते ॥ १॥
देवदेवसुतं देवं जगद्विघ्नविनाशकम् ।
हस्तिरूपं महाकायं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ २॥
वामनं जटिलं कान्तं ह्रस्वग्रीवं महोदरम् ।
धूम्रसिन्दूरयुग्गण्डं विकटं प्रकटोत्कटम् ॥ ३॥
एकदन्तं प्रलम्बोष्ठं नागयज्ञोपवीतिनम् ।
त्र्यक्षं गजमुखं कृष्णं सुकृतं रक्तवाससम् ॥ ४॥
दन्तपाणिं च वरदं ब्रह्मण्यं ब्रह्मचारिणम् ।
पुण्यं गणपतिं दिव्यं विघ्नराजं नमाम्यहम् ॥ ५॥
देवं गणपतिं नाथं विश्वस्याग्रे तु गामिनम् ।
देवानामधिकं श्रेष्ठं नायकं सुविनायकम् ॥ ६॥
नमामि भगवन्तं तं अद्भुतं गणनायकम् ।
वक्रतुण्ड प्रचण्डाय उग्रतुण्डाय ते नमः ॥ ७॥
चण्डाय गुरु चण्डाय चण्डचण्डाय ते नमः ।
मदोन्मत्तप्रमत्ताय नित्यमत्ताय ते नमः ॥ ८॥
उमासुतं नमस्यामि गङ्गापुत्राय ते नमः ।
ओङ्काराय वषट्कार स्वाहाकाराय ते नमः ॥ ९॥
मन्त्रमूर्ते महायोगिन् जातवेदो नमो नमः ।
पर्शुपाशकहस्ताय गजहस्ताय ते नमः ॥ १०॥
मेघाय मेघवर्णाय मेघेश्वर नमो नमः ।
घोराय घोररूपाय घोरघोराय ते नमः ॥ ११॥
पुराणपूर्वपूज्याय पुरुषाय नमो नमः ।
मदोत्कट नमस्तेऽस्तु नमस्ते चण्डविक्रम ॥ १२॥
विनायक नमस्तेऽस्तु नमस्ते भक्तवत्सल ।
भक्तप्रियाय शान्ताय महातेजस्विने नमः ॥ १३॥
यज्ञाय यज्ञहोत्रे च यज्ञेशाय नमो नमः ।
नमस्ते शुक्लभस्माङ्ग शुक्लमाल्यधराय च ॥ १४॥
मदक्लिन्नकपोलाय गणाधिपतये नमः ।
रक्तपुष्पप्रियायाथ रक्तचन्दनभूषित ॥ १५॥
अग्निहोत्राय शान्ताय अपराजय्य ते नमः ।
आखुवाहन देवेश एकदन्ताय ते नमः ॥ १६॥
शूर्पकर्णाय शूराय दीर्घदन्ताय ते नमः ।
विघ्नं हरतु देवेशः शिवपुत्रो विनायकः ॥ १७॥
इति मूषिकवाहस्य स्तोत्रं सर्वार्थसाधकम् ।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
सर्वकामप्रदं पुंसां पठतां शृण्वतामपि ॥ १८॥
इति मूषिकवाहनशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
हिंदी अर्थ:
श्लोक १: हे मूषिकवाहन! हाथों में मोदक धारण करने वाले, सूप जैसे कानों वाले, लटकते यज्ञोपवीत वाले! हे वामन-रूप महेश्वर-पुत्र! हे विघ्नविनायक! आपके चरणों में नमस्कार है।
श्लोक २: देवाधिदेव के पुत्र, जगत के विघ्नों का नाश करने वाले, हाथी के समान रूप वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान प्रभावाले देव को (नमन)।
श्लोक ३: वामन, जटाधारी, मनोहर, छोटी गर्दन वाले, बड़े उदर वाले, धूम्र-सिंदूर वर्ण के कपोलों वाले, विशाल, प्रकट रूप से महान।
श्लोक ४: एक दांत वाले, लंबे ओठों वाले, सर्प का यज्ञोपवीत धारण करने वाले, तीन नेत्रों वाले, गज-मुख वाले, श्याम वर्ण, सुंदर, लाल वस्त्र धारण करने वाले।
श्लोक ५: अपने टूटे दांत को हाथ में धारण करने वाले, वरदाता, ब्राह्मणों के हितैषी, ब्रह्मचारी, पुण्य-स्वरूप, दिव्य गणपति, विघ्नराज को मैं नमन करता हूं।
श्लोक ६: देव, गणपति, नाथ, जो विश्व के आगे-आगे चलते हैं, देवताओं में सबसे श्रेष्ठ, नायक, सुविनायक को (नमन)।
श्लोक ७: उस अद्भुत गणनायक भगवान को मैं नमन करता हूं। हे प्रचंड वक्रतुण्ड! हे उग्र-तुण्ड! आपको नमस्कार है।
श्लोक ८: हे चंड! हे महाचंड! हे चंडतम! आपको नमस्कार है। मद से उन्मत्त और प्रमत्त, नित्य मस्त रहने वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक ९: उमा-पुत्र को मैं नमन करता हूं, गंगा-पुत्र को नमस्कार है। हे ओंकार-स्वरूप! हे वषट्कार! हे स्वाहाकार! आपको नमस्कार है।
श्लोक १०: हे मंत्र-मूर्ति! हे महायोगी! हे जातवेद (सर्वज्ञ)! आपको बारंबार नमस्कार है। परशु और पाश हाथ में धारण करने वाले, हाथी के समान सूंड वाले, आपको नमस्कार है।
श्लोक ११: हे मेघ-स्वरूप! हे मेघ-वर्ण! हे मेघेश्वर! आपको बारंबार नमस्कार है। हे घोर! हे घोर-रूप! हे घोरतम! आपको नमस्कार है।
श्लोक १२: पुरातन, सबसे पहले पूज्य पुरुष को नमस्कार है। हे मदोत्कट! आपको नमस्कार है, हे चंड-पराक्रमी! नमस्कार है।
श्लोक १३: हे विनायक! नमस्कार है, हे भक्तवत्सल! नमस्कार है। भक्तप्रिय, शांत, महातेजस्वी को नमस्कार है।
श्लोक १४: यज्ञ-स्वरूप, यज्ञ के होता, यज्ञेश को बारंबार नमस्कार है। हे श्वेत भस्म से अंगयुक्त! हे श्वेत माला धारण करने वाले! आपको नमस्कार है।
श्लोक १५: मद से भीगे कपोलों वाले गणाधिपति को नमस्कार है। लाल पुष्प प्रिय, लाल चंदन से विभूषित को (नमन)।
श्लोक १६: अग्निहोत्र-स्वरूप, शांत, अपराजेय को नमस्कार है। हे मूषक-वाहन देवेश! हे एकदंत! आपको नमस्कार है।
श्लोक १७: सूप-कर्ण, शूरवीर, दीर्घ-दंत को नमस्कार है। शिव-पुत्र विनायक देवेश हमारे विघ्नों को हरें।
श्लोक १८ (फलश्रुति): इस प्रकार मूषकवाहन का यह स्तोत्र समस्त अर्थों को सिद्ध करने वाला है। यह सर्वमंगलों में मंगल-स्वरूप, समस्त पापों का नाश करने वाला, तथा इसे पढ़ने और सुनने वाले मनुष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
इस प्रकार यह मूषिकवाहन शतनाम स्तोत्र सम्पूर्ण होता है।
इस स्तोत्र में गणेश जी के तीन विरोधाभासी किंतु एक-दूसरे के पूरक स्वरूप
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह गणेश जी के तीन अलग-अलग, परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होने वाले, किंतु वास्तव में एक-दूसरे के पूरक स्वरूपों को एक साथ प्रस्तुत करता है:
1. वात्सल्यपूर्ण, प्रिय स्वरूप: "मोदकहस्त", "भक्तवत्सल", "भक्तप्रियाय शान्ताय" — ये विशेषण उनके सरल, प्रिय और सुलभ स्वरूप को दर्शाते हैं, जो हर भक्त के मन में तुरंत स्नेह जगाता है।
2. उग्र, रौद्र स्वरूप: "उग्रतुण्डाय", "चण्डाय...चण्डचण्डाय", "घोराय घोररूपाय घोरघोराय", "मदोन्मत्तप्रमत्ताय" — ये विशेषण गणेश जी के अत्यंत शक्तिशाली, भयंकर और अजेय स्वरूप को उजागर करते हैं, जो विघ्नों और दुष्ट-शक्तियों का संहार करने में सक्षम है।
3. वैदिक, ब्रह्म-स्वरूप: "ओङ्काराय", "वषट्कार स्वाहाकाराय", "मन्त्रमूर्ते", "जातवेदो" — ये विशेषण गणेश जी को वैदिक मंत्रों, यज्ञ-कर्मकांड और ब्रह्म-तत्त्व से सीधे जोड़ते हैं।
यह त्रिविध चित्रण दर्शाता है कि गणेश जी एक साथ स्नेहिल पिता, शक्तिशाली रक्षक और गूढ़ ब्रह्म-तत्त्व — तीनों रूपों में विद्यमान हैं।
मूषकवाहन स्तोत्र पाठ की सही विधि
- समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात, अथवा किसी भी गणेश-पूजा के समय इसका पाठ श्रेष्ठ माना जाता है।
- ध्यान सहित: प्रत्येक श्लोक में वर्णित रूप-वर्णन का मानसिक चित्रण करते हुए, गणेश जी की सम्पूर्ण दिव्य प्रतिमा का ध्यान करते हुए पाठ करें।
- पूजन सामग्री: गणेश प्रतिमा के समक्ष दीप जलाकर, लाल पुष्प, लाल चंदन और मोदक अर्पित करते हुए इसका पाठ करना पारंपरिक विधि है।
- श्रवण से भी लाभ: स्वयं फलश्रुति में कहा गया है कि इसे पढ़ने वाले के साथ-साथ सुनने वाले को भी लाभ मिलता है, इसलिए सामूहिक पाठ या श्रवण भी उपयुक्त है।
यह स्तोत्र किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है
- सर्वार्थ-सिद्धि हेतु: फलश्रुति के अनुसार यह "सर्वार्थसाधकम्" अर्थात समस्त उद्देश्यों को सिद्ध करने वाला स्तोत्र है।
- पाप-मुक्ति हेतु: "सर्वपापप्रणाशनम्" के अनुसार यह पूर्वकृत पापों के प्रभाव से मुक्ति दिलाने में सहायक है।
- समस्त कामना-पूर्ति हेतु: "सर्वकामप्रदं" के अनुसार यह पढ़ने और सुनने वाले दोनों की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है।
- भय और शत्रु-बाधा में: इसमें वर्णित गणेश जी के उग्र, अपराजेय स्वरूप के कारण यह भय और शत्रु-बाधा की स्थिति में भी विशेष सहायक माना जाता है।
जब स्वयं विधिवत पाठ करना संभव न हो
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निष्कर्ष
मूषिकवाहनशतनामस्तोत्रम् गणेश जी के रूप-सौंदर्य, उग्र शक्ति और वैदिक ब्रह्म-तत्त्व — तीनों का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। छोटे से मूषक पर सवार यह विराट देवता, अपने वात्सल्य से लेकर अपनी प्रचंड शक्ति तक, हर रूप में भक्तों की रक्षा और कल्याण के लिए तत्पर रहते हैं। जो साधक श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ या श्रवण करता है, वह निश्चय ही सर्वार्थ-सिद्धि, पाप-मुक्ति और समस्त कामनाओं की पूर्ति प्राप्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: गणेश जी का वाहन मूषक ही क्यों है? मूषक-वाहन इस बात का प्रतीक है कि गणेश जी के लिए आकार और शक्ति की कोई सीमा नहीं — संसार का सबसे विशाल देवता सबसे छोटे प्राणी की सवारी करके यह दर्शाता है कि सच्ची शक्ति भौतिक आकार में नहीं, आंतरिक सामर्थ्य में निहित है।
प्रश्न 2: इस स्तोत्र में गणेश जी के कितने प्रकार के स्वरूप वर्णित हैं? इस स्तोत्र में गणेश जी के तीन प्रमुख स्वरूप वर्णित हैं — वात्सल्यपूर्ण और भक्त-प्रिय स्वरूप, उग्र और अजेय रौद्र स्वरूप, तथा वैदिक मंत्र और ब्रह्म-तत्त्व से जुड़ा गूढ़ स्वरूप।
प्रश्न 3: इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ मिलते हैं? फलश्रुति के अनुसार यह स्तोत्र समस्त उद्देश्यों को सिद्ध करने वाला, समस्त पापों का नाश करने वाला, और इसे पढ़ने व सुनने वाले दोनों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
प्रश्न 4: इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए? प्रातःकाल स्नान के पश्चात, अथवा किसी भी गणेश-पूजा या अनुष्ठान के समय इसका पाठ श्रेष्ठ माना जाता है। इसे लाल पुष्प, लाल चंदन और मोदक अर्पित करते हुए पढ़ना पारंपरिक विधि है।
प्रश्न 5: क्या इस स्तोत्र को केवल सुनने से भी लाभ मिलता है? हां, स्वयं फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है — "पठतां शृण्वतामपि" अर्थात इसे पढ़ने वाले के साथ-साथ केवल सुनने वाले को भी समस्त कामनाओं की पूर्ति का लाभ प्राप्त होता है।
अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।
लेखक: Admin
श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती
प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026
स्थिति: प्रकाशित
