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स्कंदपुराण का रेवा खंड — नर्मदा नदी की उत्पत्ति और उसके धार्मिक महत्व की कथा

स्कंदपुराण का रेवा खंड — नर्मदा नदी की उत्पत्ति और उसके धार्मिक महत्व की कथा

स्कंदपुराण के रेवा खंड में वर्णित नर्मदा नदी की उत्पत्ति कथा, इसकी महिमा, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग से संबंध और नर्मदा स्नान-परिक्रमा के पुण्य फल को विस्तार से जानें

स्कंदपुराण का रेवा खंड — नर्मदा नदी की उत्पत्ति और उसके धार्मिक महत्व की कथा

भारत की पवित्र नदियों में नर्मदा नदी का विशेष स्थान है, जिसे "रेवा" के नाम से भी जाना जाता है। स्कंदपुराण के नागर खंड के अंतर्गत आने वाला रेवा खंड इस दिव्य नदी की उत्पत्ति, महिमा और इसके तटवर्ती तीर्थ स्थलों का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है। नर्मदा को गंगा से भी अधिक पवित्र माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि गंगा में स्नान से जो पुण्य मिलता है, वह नर्मदा के मात्र दर्शन से ही प्राप्त हो जाता है।

नर्मदा की उत्पत्ति कथा

रेवा खंड के अनुसार नर्मदा नदी की उत्पत्ति भगवान शिव के शरीर से हुई मानी जाती है। कथा के अनुसार भगवान शिव जब गहन तपस्या में लीन थे, तब उनके शरीर से पसीने की धारा प्रवाहित हुई, जो अमरकंटक क्षेत्र में एकत्रित होकर नर्मदा नदी के रूप में प्रकट हुई। इसी कारण नर्मदा को भगवान शिव की मानस पुत्री माना जाता है और इसे अत्यंत पवित्र नदी की श्रेणी में रखा गया है।

एक अन्य कथा के अनुसार राजा हिरण्यतेजा ने पुत्री प्राप्ति की कामना से भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप शिव जी ने प्रसन्न होकर अपने शरीर से एक कन्या को प्रकट किया, जिसका नाम "नर्मदा" रखा गया। यह कन्या अत्यंत तेजस्वी और सुंदर थी, जो आगे चलकर नदी स्वरूप में परिवर्तित हो गई।

अमरकंटक से उद्गम

नर्मदा नदी का उद्गम स्थल अमरकंटक, वर्तमान मध्य प्रदेश में स्थित है। रेवा खंड में अमरकंटक की महिमा का विशेष वर्णन मिलता है। यहां स्थित नर्मदा उद्गम कुंड को अत्यंत पवित्र माना जाता है, और यहां स्नान-दर्शन करने से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।

नर्मदा का पश्चिम की ओर प्रवाह

अधिकांश भारतीय नदियां पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं, परंतु नर्मदा नदी की विशेषता यह है कि यह पश्चिम दिशा में प्रवाहित होकर अरब सागर में मिलती है। स्कंदपुराण में इस विपरीत प्रवाह को भी विशेष धार्मिक महत्व दिया गया है, जो इस नदी की अद्वितीयता को दर्शाता है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग से संबंध

नर्मदा नदी के तट पर स्थित ओंकारेश्वर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। रेवा खंड में वर्णित है कि नर्मदा के मध्य द्वीप पर स्वयंभू शिवलिंग के रूप में भगवान ओंकारेश्वर विराजमान हैं। इस स्थान की भौगोलिक संरचना "ओम" के आकार जैसी बताई जाती है, जो इसकी दिव्यता को और भी बढ़ाती है।

नर्मदा के पत्थरों (शिवलिंग) का महत्व

रेवा खंड में एक अद्भुत मान्यता का वर्णन है - नर्मदा नदी में पाए जाने वाले प्रत्येक पत्थर को स्वाभाविक रूप से शिवलिंग स्वरूप माना जाता है। इन्हें "नर्मदेश्वर शिवलिंग" या "बाण लिंग" कहा जाता है। मान्यता है कि इन्हें बिना किसी विशेष प्राण-प्रतिष्ठा के भी पूजा जा सकता है, क्योंकि स्वयं नर्मदा का जल इन्हें दिव्यता प्रदान करता है।

नर्मदा परिक्रमा का महत्व

रेवा खंड में नर्मदा परिक्रमा का विशेष वर्णन मिलता है। भक्तगण नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से यात्रा प्रारंभ करके नदी के दोनों किनारों पर चलते हुए पूरी परिक्रमा करते हैं, जो लगभग 2600 किलोमीटर की दूरी तय करने के बराबर है। इस परिक्रमा को पूर्ण करने में परंपरागत रूप से लगभग तीन वर्ष का समय लगता है। मान्यता है कि यह परिक्रमा करने वाले भक्त को समस्त तीर्थों के दर्शन के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

नर्मदा स्नान का पुण्य फल

स्कंदपुराण में वर्णित है कि जहां गंगा स्नान से पाप नष्ट होते हैं, वहां नर्मदा के दर्शन मात्र से ही समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं। यह नदी इतनी पवित्र मानी जाती है कि इसमें स्नान करने वाले भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। नर्मदा तटवर्ती क्षेत्रों में महेश्वर, मंडलेश्वर, भेड़ाघाट जैसे अनेक पवित्र स्थल स्थित हैं, जहां भक्तगण दर्शन-पूजन हेतु जाते हैं।

निष्कर्ष

रेवा खंड हमें नर्मदा नदी की दिव्यता और इसकी अद्भुत उत्पत्ति कथा से परिचित कराता है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न यह नदी न केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत पवित्र मानी जाती है। नर्मदा के तट पर बसे तीर्थ स्थलों की यात्रा और परिक्रमा जीवन को धर्म और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: नर्मदा नदी की उत्पत्ति कैसे हुई? उत्तर: रेवा खंड के अनुसार नर्मदा नदी की उत्पत्ति भगवान शिव के शरीर के तेज या पसीने से हुई मानी जाती है। इसे शिव जी की मानस पुत्री कहा जाता है और अमरकंटक क्षेत्र से इसका उद्गम माना जाता है।

प्रश्न 2: नर्मदा को गंगा से अधिक पवित्र क्यों माना जाता है? उत्तर: मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से जो पुण्य मिलता है, वह नर्मदा के मात्र दर्शन से प्राप्त हो जाता है। यही कारण है कि स्कंदपुराण में नर्मदा को अत्यंत पवित्र नदी बताया गया है।

प्रश्न 3: नर्मदेश्वर शिवलिंग क्या है? उत्तर: नर्मदा नदी में स्वाभाविक रूप से पाए जाने वाले पत्थरों को नर्मदेश्वर या बाण लिंग कहा जाता है, जिन्हें स्वयं शिवलिंग स्वरूप माना जाता है। इन्हें विशेष प्राण-प्रतिष्ठा के बिना भी पूजा जा सकता है।

प्रश्न 4: नर्मदा परिक्रमा में कितना समय लगता है? उत्तर: पारंपरिक रूप से नर्मदा परिक्रमा लगभग 2600 किलोमीटर की होती है और इसे पूर्ण करने में लगभग तीन वर्ष का समय लगता है। यह परिक्रमा समस्त तीर्थों के दर्शन के समान पुण्य फल देने वाली मानी जाती है।

प्रश्न 5: ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा से कैसे जुड़ा है? उत्तर: ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा नदी के मध्य में स्थित एक द्वीप पर विराजमान है, जिसकी भौगोलिक आकृति "ओम" के समान बताई जाती है। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक अत्यंत पूजनीय स्थल है।

अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है, केवल सामान्य जानकारी हेतु है। व्यक्तिगत निर्णय लेने से पूर्व विद्वान पंडित या गुरु से परामर्श अवश्य करें।

लेखक: Admin

श्रेणी: सनातन ज्ञान

प्रकाशन तिथि: 4 अगस्त 2026

स्थिति: प्रकाशित