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सकट चौथ (तिलकुटा चौथ) व्रत: गणेश-चंद्र संयुक्त पूजा से कैसे होता है संकट नाश

सकट चौथ (तिलकुटा चौथ) व्रत: गणेश-चंद्र संयुक्त पूजा से कैसे होता है संकट नाश

सकट चौथ (तिलकुटा चौथ) व्रत विधि जानें — गणेश-चंद्र संयुक्त पूजा से संकट नाश का ज्योतिषीय महत्व, पूजा विधि, मंत्र और राशि अनुसार उपाय

संतान की सुरक्षा और विघ्नों के नाश का व्रत

सकट चौथ, जिसे "तिलकुटा चौथ" अथवा "संकष्टी चतुर्थी" भी कहा जाता है, माघ मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु और समस्त संकटों से रक्षा के लिए रखा जाता है। इस दिन तिल और गुड़ से बने पकवानों का विशेष महत्व होने के कारण इसे "तिलकुटा चौथ" के नाम से भी जाना जाता है।

ज्योतिष शास्त्र में इस व्रत का गहरा संबंध भगवान गणेश और चंद्रमा दोनों से माना जाता है, क्योंकि गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, जबकि चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक ग्रह है। इस लेख में हम सकट चौथ व्रत के ज्योतिषीय महत्व, इसकी सही विधि और गणेश-चंद्र संयुक्त पूजा से संकट नाश करने के विशेष उपायों को विस्तार से समझेंगे।

सकट चौथ का पौराणिक महत्व

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान गणेश के दांत टूट गए थे, जिसे देखकर उनकी माता पार्वती अत्यंत चिंतित हो गईं। तब सकट माता (जिन्हें संकटा माता भी कहा जाता है) ने भगवान गणेश की रक्षा की और उन्हें समस्त संकटों से मुक्त किया। इसी घटना की स्मृति में सकट चौथ का व्रत रखा जाता है, जिसमें सकट माता के साथ भगवान गणेश की भी पूजा की जाती है, ताकि संतान के जीवन के समस्त संकट और विघ्न दूर हो सकें।

सकट चौथ और गणेश-चंद्र का ज्योतिषीय संबंध

ज्योतिष शास्त्र में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि के अधिष्ठाता देवता माना गया है, जिनका संबंध बुध ग्रह से जोड़ा जाता है, जबकि चंद्रमा मन, भावनाओं और मातृत्व का कारक ग्रह है। चतुर्थी तिथि पर चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने की विशेष परंपरा है, जो इस दिन की पूजा को चंद्रमा से भी जोड़ती है।

जब संतान की कुंडली में कोई ग्रह दोष अथवा विघ्न बाधा हो, तो गणेश-चंद्र की संयुक्त उपासना इन बाधाओं को दूर करने में विशेष सहायक मानी जाती है। भगवान गणेश स्वयं विघ्नों का नाश करते हैं, जबकि चंद्रमा की पूजा मन की शांति और भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करती है, जो संतान के समग्र कल्याण के लिए आवश्यक है।

किन जातकों के लिए है यह व्रत विशेष लाभकारी

  1. जिनकी संतान के जीवन में बार-बार विघ्न-बाधाएं आती हों
  2. जो अपनी संतान की सुरक्षा और दीर्घायु की कामना रखती हों
  3. जिनकी संतान की कुंडली में चंद्रमा अथवा बुध पीड़ित अवस्था में हो
  4. जो अपने जीवन के व्यक्तिगत संकटों से भी मुक्ति चाहते हों
  5. जो नियमित रूप से गणेश-चंद्र की कृपा प्राप्त करना चाहते हों

सकट चौथ व्रत की संपूर्ण विधि

चतुर्थी तिथि के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और सकट माता तथा भगवान गणेश के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

दिनभर व्रत — माताएं दिनभर निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखते हुए सकट माता और गणेश जी का ध्यान करती हैं।

तिलकुट प्रसाद — इस दिन तिल और गुड़ से विशेष पकवान (तिलकुट) बनाया जाता है, जिसे भगवान गणेश को भोग स्वरूप अर्पित किया जाता है।

संध्या पूजन — संध्या समय सकट माता और भगवान गणेश की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित करें और तिल, गुड़, दूर्वा तथा मोदक अर्पित करें। चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य दें।

मंत्र जाप:

गणेश मंत्र:

ॐ गं गणपतये नमः

सकट माता मंत्र:

ॐ संकटा देव्यै नमः

चंद्र मंत्र:

ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः

मंत्र जाप के पश्चात सकट चौथ व्रत कथा का श्रवण करें। चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात व्रत का पारण किया जाता है।

संकट नाश हेतु विशेष ज्योतिषीय उपाय

सकट चौथ के दिन संकट नाश हेतु कुछ विशेष उपाय भी किए जा सकते हैं। इस दिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है, जिससे समस्त विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। जिनकी संतान के जीवन में विशेष रूप से समस्याएं हों, वे इस दिन संतान के नाम से तिल-गुड़ का दान करें। चंद्रमा को अर्घ्य देते समय दूध मिश्रित जल का उपयोग करना भी मानसिक शांति प्रदान करने में सहायक माना जाता है।

तिल-गुड़ के सेवन का गहन ज्योतिषीय महत्व

सकट चौथ पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है, क्योंकि तिल शनि ग्रह से संबंधित माना जाता है, जबकि गुड़ गुरु ग्रह का प्रतीक है। यह संयोग यह दर्शाता है कि इस व्रत के माध्यम से न केवल गणेश-चंद्र, बल्कि शनि और गुरु दोनों ग्रहों की ऊर्जा को भी संतुलित करने का प्रयास किया जाता है, जिससे संतान के जीवन में स्थिरता और समृद्धि दोनों की प्राप्ति होती है।

राशि अनुसार सकट चौथ व्रत पर विशेष ध्यान

मिथुन, कन्या (बुध प्रधान राशियां) — यदि संतान की राशि यह हो, तो गणेश पूजन विशेष फलदायी है। दूर्वा अर्पण अत्यंत लाभकारी रहेगा।

कर्क (चंद्र स्वराशि) — यदि संतान की राशि यह हो, तो चंद्र अर्घ्य विशेष शुभ माना गया है।

मकर, कुंभ (शनि प्रधान राशियां) — यदि संतान की राशि यह हो, तो तिल का दान विशेष लाभकारी रहेगा।

मेष, वृषभ, सिंह, तुला, वृश्चिक, धनु, मीन — यदि संतान की राशि यह हो, तो माताएं श्रद्धापूर्वक सकट चौथ व्रत रखकर गणेश-चंद्र की कृपा प्राप्त करें।

सकट चौथ व्रत में क्या करें, क्या न करें

व्रत के दौरान चंद्रोदय से पूर्व भोजन ग्रहण न करें। तामसिक भोजन, मांस-मदिरा से पूर्णतः दूर रहें। पूजा में तुलसी दल का उपयोग न करें, क्योंकि गणेश पूजन में यह वर्जित माना जाता है। दिनभर संतान के प्रति सकारात्मक विचार और प्रार्थना बनाए रखें।

सकट चौथ व्रत के ज्योतिषीय लाभ

नियमित रूप से सकट चौथ व्रत रखने से संतान के जीवन के विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से उन माताओं के लिए लाभकारी है जिनकी संतान को बार-बार संकटों का सामना करना पड़ रहा हो। इसके अतिरिक्त यह व्रत परिवार में सुख-समृद्धि, बुद्धि-विवेक और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने में भी सहायक सिद्ध होता है।

जब स्वयं विधिपूर्वक पूजा करना संभव न हो

बहुत सी माताएं व्यस्तता अथवा सही विधि की जानकारी न होने के कारण सकट चौथ की संपूर्ण पूजा विधिपूर्वक संपन्न नहीं कर पातीं। ऐसी स्थिति में अनुभवी आचार्यों के माध्यम से गणेश-चंद्र पूजन अथवा संकट नाश हेतु विशेष अनुष्ठान ऑनलाइन भी संपन्न कराया जा सकता है, जिससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।

निष्कर्ष

सकट चौथ (तिलकुटा चौथ) व्रत केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गणेश-चंद्र की संयुक्त कृपा से संतान के जीवन के समस्त संकटों को दूर करने का एक गहन ज्योतिषीय माध्यम भी है। जिन माताओं की संतान को बार-बार विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ रहा हो, उनके लिए यह व्रत श्रद्धापूर्वक रखा जाए तो निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम ला सकता है। अपनी संतान की कुंडली की सटीक स्थिति जानने के लिए किसी अनुभवी ज्योतिषाचार्य से परामर्श अवश्य लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सकट चौथ व्रत किस तिथि को रखा जाता है? सकट चौथ व्रत प्रतिवर्ष माघ मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इसे तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन तिल-गुड़ से बने पकवानों का विशेष महत्व है।

प्रश्न 2: सकट माता कौन हैं? सकट माता (संकटा माता) को भगवान गणेश की रक्षक देवी माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार उन्होंने भगवान गणेश के दांत टूटने के समय उनकी रक्षा की थी।

प्रश्न 3: चंद्रोदय से पहले भोजन क्यों वर्जित है? इस व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात ही पारण किया जाता है, इसीलिए चंद्रोदय से पहले भोजन ग्रहण करना वर्जित माना गया है, जो व्रत की पवित्रता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 4: तिल-गुड़ का इस व्रत में क्या महत्व है? तिल शनि ग्रह और गुड़ गुरु ग्रह से संबंधित माना जाता है। इनका सेवन इस व्रत में शनि-गुरु दोनों की ऊर्जा को संतुलित करने का प्रतीक है, जो संतान के जीवन में स्थिरता लाता है।

प्रश्न 5: क्या ऑनलाइन गणेश-चंद्र पूजा प्रभावी होती है? अनुभवी आचार्य द्वारा शास्त्रोक्त विधि से संपन्न कराई गई ऑनलाइन पूजा भी उतनी ही फलदायी मानी जाती है, बशर्ते संकल्प, मंत्र जाप और विधि-विधान का पूर्ण पालन किया जाए।

अस्वीकरण: यह लेख ज्योतिष शास्त्र और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। व्यक्तिगत मार्गदर्शन हेतु योग्य ज्योतिषाचार्य से परामर्श अवश्य करें।

लेखक: Admin

श्रेणी: उपाय

प्रकाशन तिथि: 10 अगस्त 2026

स्थिति: प्रकाशित