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सावन में महादेव को भांग-धतूरा चढ़ाने से क्यों पूर्ण होती है मनोकामना?

सावन में महादेव को भांग-धतूरा चढ़ाने से क्यों पूर्ण होती है मनोकामना?

सावन में भगवान शिव को भांग और धतूरा क्यों प्रिय है? जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा, अर्पित करने की सही विधि, नियम और इससे मनोकामना पूर्ण होने का रहस्य।

सावन में महादेव को भांग-धतूरा चढ़ाने से क्यों पूर्ण होती है मनोकामना?

क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान शिव को ही भांग और धतूरा क्यों प्रिय है, जबकि किसी अन्य देवी-देवता की पूजा में इन्हें अर्पित नहीं किया जाता? सावन के महीने में जब भी आप किसी शिव मंदिर में जाते हैं, तो शिवलिंग पर चढ़ा हुआ भांग और धतूरा जरूर देखने को मिलता है। यह दृश्य जितना सामान्य लगता है, इसके पीछे उतनी ही गहरी पौराणिक कथा और आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। यदि आप भी जानना चाहते हैं कि आखिर यह परंपरा कैसे शुरू हुई, इसे चढ़ाने से मनोकामना कैसे पूर्ण होती है, और सही विधि क्या है, तो यह लेख आपके लिए ही है।

भांग और धतूरा से जुड़ा रहस्य: आखिर क्यों है शिव को इतना प्रिय

भगवान शिव को "औघड़दानी" और "भोलेनाथ" कहा जाता है, क्योंकि वे अपने भक्तों की छोटी सी श्रद्धा से भी प्रसन्न हो जाते हैं। जहां अन्य देवी-देवताओं की पूजा में मिष्ठान्न, फल और कीमती वस्तुएं अर्पित करने की परंपरा है, वहीं भगवान शिव को जंगली और साधारण वस्तुएं जैसे भांग, धतूरा, बेलपत्र और राख भी अत्यंत प्रिय हैं। यही कारण है कि शिव भक्ति को सबसे सरल और सर्वसुलभ भक्ति माना जाता है। आइए समझते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा और गहरा अर्थ।

समुद्र मंथन और हलाहल विष की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तो सबसे पहले समुद्र से हलाहल नामक भयंकर विष निकला। यह विष इतना प्रचंड था कि इसके प्रभाव से सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश हो सकता था। ऐसे संकट की घड़ी में देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की, कि वे ही इस विष का पान करके संसार की रक्षा करें। भगवान शिव ने बिना किसी संकोच के वह विष पी लिया, लेकिन माता पार्वती ने उस विष को कंठ से नीचे न जाने देकर वहीं रोक लिया, जिससे भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और उन्हें "नीलकंठ" कहा जाने लगा।

विष के प्रभाव से भगवान शिव के शरीर में अत्यधिक गर्मी और जलन उत्पन्न हो गई थी। देवताओं ने उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए जल, दूध और विभिन्न शीतल वस्तुओं का प्रयोग किया। मान्यता है कि इसी दौरान भांग और धतूरा जैसी शीतल प्रकृति की वनस्पतियां भी भगवान शिव को अर्पित की गईं, ताकि विष के प्रभाव से उत्पन्न ताप को शांत किया जा सके। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि भगवान शिव को भांग और धतूरा अर्पित करने से उनका आशीर्वाद और शीतलता का वरदान प्राप्त होता है।

भांग की शीतल प्रकृति और इसका प्रतीकात्मक अर्थ

आयुर्वेद में भांग को शीतल प्रकृति का माना गया है, और इसी कारण इसे "विष नाशक" वनस्पति के रूप में भी देखा जाता है। भगवान शिव, जिन्होंने संसार के कल्याण के लिए स्वयं विष धारण किया, उन्हें शीतल प्रकृति की वस्तुएं अर्पित करना धार्मिक दृष्टि से अत्यंत उचित माना जाता है। भांग अर्पित करने का प्रतीकात्मक अर्थ यह भी है कि भक्त अपने जीवन के सभी विषैले विचार, नकारात्मकता और मानसिक तनाव भगवान शिव को समर्पित कर रहा है, ताकि वे उसे शांति और शीतलता प्रदान करें।

धतूरा का महत्व और इसका गहरा प्रतीक

धतूरा एक ऐसा पौधा है जो दिखने में अत्यंत सुंदर होता है, लेकिन इसके फल और बीज विषैले माने जाते हैं। भगवान शिव को यह पौधा इसलिए भी प्रिय माना जाता है क्योंकि वे संहार और सृजन दोनों के देवता हैं, और धतूरा इसी द्वैत यानी सुंदरता व विष के मिश्रण का प्रतीक है। इसके अलावा एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया, तब उनके शरीर के रोम कूपों से जो विष रिसकर पृथ्वी पर गिरा, उन्हीं बूंदों से धतूरे के पौधे की उत्पत्ति हुई। इसीलिए धतूरा भगवान शिव के विषपान की स्मृति और उनके त्याग का प्रतीक माना जाता है।

भांग-धतूरा अर्पित करने से मनोकामना पूर्ण होने का रहस्य

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर भांग और धतूरा चढ़ाने से मनोकामना कैसे पूर्ण होती है। इसके पीछे कई आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक कारण बताए जाते हैं:

श्रद्धा और सरलता का प्रतीक

भगवान शिव को "भोलेनाथ" इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे भक्त की सच्ची श्रद्धा को महत्व देते हैं, न कि पूजा सामग्री के मूल्य को। भांग और धतूरा जैसी सामान्य व सहज उपलब्ध वस्तुएं अर्पित करने से भक्त यह सिद्ध करता है कि वह किसी दिखावे के बिना, सरल हृदय से भगवान की शरण में आया है। यही सरलता और समर्पण भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करती है।

त्याग और समर्पण की भावना

जिस प्रकार भगवान शिव ने संसार के कल्याण के लिए स्वयं विष का पान किया, उसी प्रकार भक्त जब भांग-धतूरा अर्पित करता है, तो वह अपने अहंकार, नकारात्मक विचारों और मानसिक विषों को त्यागने का संकल्प लेता है। यह त्याग भावना ही मनोकामना पूर्ण होने का मूल कारण मानी जाती है, क्योंकि शुद्ध और निर्मल मन से की गई प्रार्थना अधिक शीघ्रता से फलित होती है।

शिव तत्व से जुड़ाव

धार्मिक मान्यता है कि भांग और धतूरा अर्पित करते समय भक्त का मन पूर्ण रूप से शिव तत्व यानी वैराग्य, संतुलन और आत्म-नियंत्रण से जुड़ जाता है। यह जुड़ाव भक्त के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे उसके निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से उसकी मनोकामनाओं को पूर्ण करने में सहायक सिद्ध होता है।

सावन के विशेष प्रभाव के साथ जुड़ाव

सावन का महीना स्वयं ही शिव भक्ति के लिए सर्वाधिक ऊर्जावान समय माना जाता है। इस दौरान जब भांग-धतूरा जैसी विशेष सामग्री शिवलिंग पर अर्पित की जाती है, तो मान्यता है कि भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण करते हैं, क्योंकि यह समय स्वयं शिवमय ऊर्जा से परिपूर्ण रहता है।

भांग-धतूरा अर्पित करने की सही विधि

भांग और धतूरा अर्पित करते समय कुछ विशेष विधि का पालन करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

पूजा से पहले की तैयारी

पूजा वाले दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर या शिवलिंग स्थान को गंगाजल से पवित्र करें। पूजा के लिए ताजा भांग के पत्ते और साबुत धतूरे का फूल या फल एकत्रित करें।

शिवलिंग का अभिषेक

सबसे पहले शिवलिंग पर शुद्ध जल अर्पित करें, इसके पश्चात दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें। अभिषेक के बाद पुनः जल अर्पित कर शिवलिंग को स्वच्छ करें।

भांग-धतूरा अर्पण

अभिषेक के पश्चात शिवलिंग पर भस्म और चंदन का तिलक लगाएं। इसके बाद बेलपत्र अर्पित करें, फिर धतूरे का फूल या फल शिवलिंग पर चढ़ाएं। भांग के पत्तों को भी शिवलिंग पर श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। ध्यान रखें कि यह सामग्री सीधे शिवलिंग पर स्पर्श कराते हुए अर्पित की जाए, न कि दूर से फेंकते हुए।

मंत्र जाप

सामग्री अर्पित करते समय "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का उच्चारण करें। इसके अतिरिक्त "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे" अर्थात महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना भी विशेष फलदायी माना जाता है, विशेषकर जब आप स्वास्थ्य या दीर्घायु से जुड़ी मनोकामना लेकर पूजा कर रहे हों।

आरती और प्रसाद वितरण

पूजा के अंत में भगवान शिव की आरती करें और प्रसाद स्वरूप फल-मिठाई का वितरण करें। पूजा में अर्पित की गई भांग-धतूरा सामग्री का सेवन नहीं किया जाता, इसे श्रद्धापूर्वक विसर्जित कर दिया जाता है।

भांग-धतूरा अर्पित करते समय बरती जाने वाली सावधानियां

  • भांग और धतूरा दोनों ही विषैली प्रकृति के माने जाते हैं, इसलिए इन्हें केवल पूजा में अर्पित करने तक सीमित रखें और इनका सेवन करने से पूर्णतः बचें।
  • धतूरे के फल और बीज विषैले होते हैं, इसलिए छोटे बच्चों को इनसे दूर रखें।
  • पूजा सामग्री को छूने के बाद हाथों को अच्छी तरह धो लें।
  • अर्पित की गई सामग्री का सेवन कभी न करें, इसे केवल भगवान को समर्पित करने के भाव से ही चढ़ाया जाता है।
  • यदि आपको किसी वनस्पति से एलर्जी की समस्या हो, तो सामग्री को छूने से पहले सावधानी बरतें।

सावन में भांग-धतूरा कब अर्पित करना चाहिए

सावन के प्रत्येक सोमवार, प्रदोष व्रत और विशेषकर सावन शिवरात्रि के दिन भांग-धतूरा अर्पित करना सर्वाधिक शुभ माना जाता है। प्रातःकाल के समय की गई पूजा अधिक फलदायी मानी जाती है, हालांकि प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के समय भी यह सामग्री अर्पित की जा सकती है। जो भक्त नियमित रूप से यह उपाय नहीं कर पाते, वे कम से कम सावन के महीने में एक बार इसे अवश्य अपनाएं।

भांग-धतूरा अर्पण से जुड़े अन्य लाभकारी उपाय

  • मानसिक तनाव और अशांति से मुक्ति के लिए शिवलिंग पर भांग-धतूरा अर्पित करते समय "ॐ नमः शिवाय" का 108 बार जाप करें।
  • कार्यों में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए धतूरे के फूल के साथ बेलपत्र भी अर्पित करें, यह संयोजन विशेष फलदायी माना जाता है।
  • स्वास्थ्य लाभ की कामना करने वाले भक्त भांग-धतूरा अर्पित करते समय महामृत्युंजय मंत्र का जाप अवश्य करें।
  • वैवाहिक जीवन में सुख के लिए शिव-पार्वती दोनों की संयुक्त पूजा करते हुए भांग-धतूरा और सुहाग सामग्री एक साथ अर्पित करें।

भांग-धतूरा से जुड़ी लोक मान्यताएं

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भांग-धतूरा अर्पित करने से जुड़ी अलग-अलग लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ स्थानों पर मान्यता है कि सावन शिवरात्रि की रात्रि में भांग-धतूरा अर्पित करने से समस्त ग्रह दोषों का निवारण होता है। कुछ क्षेत्रों में यह भी माना जाता है कि विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए कुंवारी कन्याएं शिवलिंग पर धतूरे का फूल अर्पित करती हैं। इन सभी मान्यताओं के मूल में एक ही भाव निहित है - सच्ची श्रद्धा और समर्पण के साथ भगवान शिव की आराधना करना।

भारतीय संस्कृति में भांग-धतूरा और शिव भक्ति का ऐतिहासिक संबंध

भारतीय धार्मिक साहित्य में भगवान शिव को हमेशा एक ऐसे देवता के रूप में चित्रित किया गया है, जो सांसारिक बंधनों और भौतिक सुख-सुविधाओं से परे रहते हैं। वे श्मशान में निवास करते हैं, भस्म धारण करते हैं, सर्पों को आभूषण की तरह पहनते हैं और जंगली वनस्पतियों को अपनी पूजा सामग्री मानते हैं। यह सब उनके वैराग्य और संसार से परे होने का प्रतीक है। भांग और धतूरा भी इसी वैराग्य भाव से जुड़ी वनस्पतियां हैं, जो जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में स्वाभाविक रूप से उगती हैं। इन्हें किसी बगीचे में सहेजकर नहीं उगाया जाता, बल्कि ये प्रकृति की गोद में स्वतः ही पनपती हैं। यही कारण है कि भगवान शिव, जो स्वयं प्रकृति के सबसे करीब माने जाते हैं, उन्हें ये वनस्पतियां अत्यंत प्रिय हैं।

शैव परंपरा में सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि जो वस्तुएं सामान्यतः अशुभ या तुच्छ मानी जाती हैं, भगवान शिव उन्हें भी स्वीकार करके यह संदेश देते हैं कि उनकी दृष्टि में कोई भी वस्तु या व्यक्ति तुच्छ नहीं है। यही कारण है कि निर्धन से निर्धन भक्त भी बिना किसी हीन भावना के शिवलिंग पर भांग-धतूरा अर्पित कर सकता है, और भगवान शिव उसकी भक्ति को उतने ही भाव से स्वीकार करते हैं जितना किसी धनी भक्त की स्वर्ण-आभूषणों से सजी पूजा को।

तंत्र और योग परंपरा में भांग-धतूरा का प्रतीकात्मक महत्व

तांत्रिक और योग परंपराओं में भी भांग-धतूरा का विशेष स्थान रहा है। इन परंपराओं के अनुसार भगवान शिव को योगियों का राजा यानी "आदियोगी" माना जाता है, जिन्होंने संसार को योग विद्या का ज्ञान दिया। योग साधना में मन की चंचलता को नियंत्रित करना सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती है। भांग की शीतल प्रकृति को प्रतीकात्मक रूप से मन की चंचलता को शांत करने वाली वनस्पति के रूप में देखा जाता है, हालांकि यह प्रतीकात्मकता केवल पूजा और अर्पण तक ही सीमित है, इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि इसका सेवन साधना का हिस्सा है। धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख विशुद्ध रूप से भगवान शिव को अर्पित करने वाली सामग्री के रूप में ही मिलता है।

विभिन्न शिव पुराणों और ग्रंथों में भांग-धतूरा का उल्लेख

शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों और उनकी प्रिय वस्तुओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में बताया गया है कि भगवान शिव अपने भक्तों की सामाजिक स्थिति, धन-संपत्ति या पूजा सामग्री की कीमत नहीं देखते, बल्कि उनके हृदय की पवित्रता और भाव को महत्व देते हैं। यही कारण है कि इन ग्रंथों में वर्णित शिव पूजा की सामग्री सूची में बेलपत्र, भांग, धतूरा, राख और जल जैसी अत्यंत सरल और प्रकृति से जुड़ी वस्तुओं को प्रमुखता दी गई है। इसके विपरीत अन्य देवताओं की पूजा पद्धति में स्वर्ण, रेशमी वस्त्र और कीमती इत्र जैसी वस्तुओं का अधिक उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि भगवान शिव की भक्ति सबसे सहज और सर्वसुलभ भक्ति है।

कुंडली और ज्योतिष शास्त्र में भांग-धतूरा अर्पण का महत्व

ज्योतिष शास्त्र में भी भांग-धतूरा अर्पित करने को कुछ विशेष ग्रह दोषों के निवारण से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि जिन जातकों की कुंडली में शनि, राहु या केतु से जुड़े दोष हों, उनके लिए सावन के महीने में शिवलिंग पर भांग-धतूरा अर्पित करना विशेष लाभकारी सिद्ध होता है। चूंकि भगवान शिव को समस्त ग्रहों के अधिपति के रूप में भी पूजा जाता है, इसलिए उनकी प्रसन्नता से समस्त ग्रह दोषों में स्वतः ही शांति आने की मान्यता है। विशेष रूप से जो जातक बार-बार असफलता, विलंब या मानसिक अशांति का सामना कर रहे हों, उनके लिए यह उपाय सहायक बताया जाता है।

भांग-धतूरा अर्पण और मानसिक स्वास्थ्य के बीच का प्रतीकात्मक संबंध

आधुनिक जीवनशैली में तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी समस्याएं आम हो चुकी हैं। ऐसे में शिव पूजा और भांग-धतूरा अर्पण की परंपरा को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। जब कोई भक्त श्रद्धापूर्वक पूजा में सम्मिलित होता है, मंत्र जाप करता है और अपनी चिंताओं को भगवान शिव के समक्ष व्यक्त करता है, तो यह प्रक्रिया मानसिक रूप से हल्केपन और शांति का अनुभव कराती है। यह ठीक उसी तरह है जैसे किसी विश्वसनीय व्यक्ति के समक्ष अपने मन की बात कहने से बोझ हल्का महसूस होता है। पूजा-अर्चना की यह प्रक्रिया आत्म-चिंतन और मानसिक स्थिरता को बढ़ावा देती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति के निर्णयों और जीवन की दिशा को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

भांग-धतूरा से जुड़ी क्षेत्रीय परंपराएं

भारत के अलग-अलग हिस्सों में भांग-धतूरा अर्पित करने की परंपरा में थोड़ा-थोड़ा भिन्नता देखने को मिलती है। उत्तर भारत के प्रसिद्ध शिव मंदिरों जैसे काशी विश्वनाथ, महाकालेश्वर और बाबा बैद्यनाथ धाम में सावन के दौरान भांग-धतूरा अर्पण की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। इन मंदिरों में विशेष रूप से सावन सोमवार और शिवरात्रि के दिन भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो कतारबद्ध होकर शिवलिंग पर जलाभिषेक के साथ-साथ भांग-धतूरा भी अर्पित करते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों जैसे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में स्थानीय रूप से उगने वाले धतूरे के पौधों का उपयोग पूजा में विशेष रूप से किया जाता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में यह वनस्पति सहजता से उपलब्ध होती है।

सच्ची भक्ति ही है असली उपाय

अंततः यह समझना आवश्यक है कि भांग-धतूरा जैसी सामग्री अर्पित करना अपने आप में कोई जादुई क्रिया नहीं है, बल्कि यह भक्त की श्रद्धा और समर्पण को व्यक्त करने का एक माध्यम मात्र है। शास्त्रों में बार-बार यह बताया गया है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे आवश्यक तत्व है शुद्ध हृदय, निष्कपट भाव और नियमों का पालन। पूजा सामग्री चाहे कितनी भी सरल या साधारण क्यों न हो, यदि उसे सच्चे मन से अर्पित किया जाए, तो वह उतनी ही फलदायी सिद्ध होती है जितनी कोई कीमती वस्तु। इसलिए इस सावन जब भी आप शिवलिंग पर भांग-धतूरा अर्पित करें, तो अपने मन में सच्ची श्रद्धा, त्याग की भावना और सकारात्मक विचार अवश्य रखें।

निष्कर्ष

भगवान शिव को भांग और धतूरा अर्पित करने की यह पूरी परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और सरलता की गहरी शिक्षा भी देती है। जिस प्रकार भगवान शिव ने संसार के कल्याण के लिए विष धारण किया, उसी भावना से जब भक्त श्रद्धापूर्वक यह सामग्री अर्पित करता है, तो वह अपने भीतर की नकारात्मकता को त्यागने का संकल्प लेता है। यही शुद्ध भाव और सच्ची भक्ति ही मनोकामना पूर्ण होने का वास्तविक रहस्य है। इस सावन सही विधि और नियमों के साथ भगवान शिव की आराधना करें और उनकी विशेष कृपा प्राप्त करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: भगवान शिव को भांग-धतूरा क्यों चढ़ाया जाता है? उत्तर: समुद्र मंथन के दौरान विषपान से उत्पन्न ताप को शांत करने के लिए भगवान शिव को शीतल प्रकृति की भांग-धतूरा अर्पित करने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी श्रद्धा और समर्पण के प्रतीक रूप में जारी है।

प्रश्न 2: क्या भांग-धतूरा चढ़ाने के बाद इसका सेवन किया जा सकता है? उत्तर: नहीं, पूजा में अर्पित सामग्री का सेवन नहीं किया जाता। यह विषैली वनस्पति है, इसे केवल भगवान को समर्पित करने के भाव से ही चढ़ाया जाता है, सेवन से बचना चाहिए।

प्रश्न 3: क्या भांग-धतूरा केवल सावन में ही अर्पित करना चाहिए? उत्तर: यह किसी भी सोमवार या प्रदोष व्रत के दिन अर्पित किया जा सकता है, लेकिन सावन के महीने और शिवरात्रि के दिन इसका महत्व और फल कई गुना बढ़ जाता है।

प्रश्न 4: धतूरे का फूल शिवलिंग पर किस समय अर्पित करना चाहिए? उत्तर: प्रातःकाल स्नान के बाद जलाभिषेक और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने के क्रम में ही धतूरे का फूल चढ़ाना शुभ माना जाता है, विशेषकर प्रदोष काल में।

प्रश्न 5: क्या केवल भांग-धतूरा चढ़ाने से ही मनोकामना पूर्ण हो जाती है? उत्तर: यह सामग्री श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है, परंतु मान्यता है कि इसके साथ नियमित पूजा, सच्चे मन और अच्छे कर्मों का संयोजन ही मनोकामना पूर्ण करने में सहायक होता है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और लोक-परंपराओं पर आधारित है। astropujatirth.com इसकी वैज्ञानिक पुष्टि का दावा नहीं करता है। भांग और धतूरा दोनों ही विषैली प्रकृति की वनस्पतियां हैं, इन्हें केवल पूजा-अर्चना तक सीमित रखें और इनके सेवन से पूर्णतः बचें। किसी भी पूजा-विधि या उपाय को अपनाने से पहले कृपया किसी योग्य ज्योतिषी या पंडित से परामर्श अवश्य करें।

लेखक: Admin

श्रेणी: सावन स्पेशल

प्रकाशन तिथि: 21 जुलाई 2026

स्थिति: प्रकाशित