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वरद गणेश स्तोत्रम्: वरदविनायक के 108 नामों में छिपा हर इच्छा-पूर्ति का वरदान

वरद गणेश स्तोत्रम्: वरदविनायक के 108 नामों में छिपा हर इच्छा-पूर्ति का वरदान

श्री वरदगणेश अष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और महत्व जानें। वरदविनायक को समर्पित 108 नामों का यह श्लोकबद्ध स्तोत्र मनचाही कामनाओं की सिद्धि देता है।

Varad Ganesh Stotram: The Boon of Every Wish Hidden in Varadavinayaka's 108 Names

"वरद" अर्थात वरदान देने वाले गणेश का विशेष स्वरूप

अष्टविनायक यात्रा के आठ पवित्र स्थानों में से एक है महड (महाड), जहां भगवान गणेश वरदविनायक के रूप में विराजमान हैं। "वरद" शब्द का अर्थ ही है — वरदान देने वाला। यही कारण है कि वरदविनायक को विशेष रूप से भक्तों की मनोकामनाएं तुरंत पूर्ण करने वाला स्वरूप माना जाता है, और उनके दर्शन-मात्र से भक्तों की इच्छाएं पूर्ण होने की मान्यता है।

इसी वरदविनायक को समर्पित श्रीवरदगणेशाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् एक अत्यंत सुंदर और श्लोकबद्ध रचना है, जिसमें गणेश जी के 108 नामों को पंद्रह श्लोकों में पिरोया गया है। पिछले अष्टोत्तरशतनामावली (जिसमें प्रत्येक नाम के साथ अलग से "ॐ...नमः" जोड़ा जाता है) से यह इस मायने में भिन्न है कि यहां सभी 108 नाम काव्यात्मक श्लोकों के रूप में गुंथे हुए हैं, जिससे इसका पाठ अधिक प्रवाहमय और सरल हो जाता है।

श्रीवरदगणेशाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित

गणेशो विघ्नराजश्च विघ्नहर्ता गणाधिपः ।

लम्बोदरो वक्रतुण्डो विकटो गणनायकः ॥ १॥


गजास्यः सिद्धिदाता च खर्वो मूषकवाहनः ।

मूषको गणराजश्च शैलजानन्ददायकः ॥ २॥


गुहाग्रजो महातेजाः कुब्जो भक्तप्रियः प्रभुः ।

सिन्दूराभो गणाध्यक्षस्त्रिनेत्रो धनदायकः ॥ ३॥


वामनः शूर्पकर्णश्च धूम्रः शङ्करनन्दनः ।

सर्वार्तिनाशको विज्ञः कपिलो मोदकप्रियः ॥ ४॥


सङ्कष्टनाशनो देवः सुरासुरनमस्कृतः ।

उमासुतः कृपालुश्च सर्वज्ञः प्रियदर्शनः ॥ ५॥


हेरम्बो रक्तनेत्रश्च स्थूलमूर्तिः प्रतापवान् ।

सुखदः कार्यकर्त्ता च बुद्धिदो व्याधिनाशकः ॥ ६॥


इक्षुदण्डप्रियः शूरः क्षमायुक्तोऽघनाशकः ।

एकदन्तो महोदारः सर्वदो गजकर्षकः ॥ ७॥


विनायको जगत्पूज्यः फलदो दीनवत्सलः ।

विद्याप्रदो महोत्साहो दुःखदौर्भाग्यनाशकः ॥ ८॥


मिष्टप्रियो भालचन्द्रो नित्यसौभाग्यवर्धनः ।

दानपूरार्द्रगण्डश्च अंशको विबुधप्रियः ॥ ९॥


रक्ताम्बरधरः श्रेष्ठः सुभगो नागभूषणः ।

शत्रुध्वंसी चतुर्बाहुः सौम्यो दारिद्र्यनाशकः ॥ १०॥


आदिपूज्यो दयाशीलो रक्तमुण्डो महोदयः ।

सर्वगः सौख्यकृच्छुद्धः कृत्यपूज्यो बुधप्रियः ॥ ११॥


सर्वदेवमयः शान्तो भुक्तिमुक्तिप्रदायकः ।

विद्यावान्दानशीलश्च वेदविन्मन्त्रवित्सुधीः ॥ १२॥


अविज्ञातगतिर्ज्ञानी ज्ञानिगम्यो मुनिस्तुतः ।

योगज्ञो योगपूज्यश्च भालनेत्रः शिवात्मजः ॥ १३॥


सर्वमन्त्रमयः श्रीमान् अवशो वशकारकः ।

विघ्नध्वंसी सदा हृष्टो भक्तानां फलदायकः ॥ १४॥


इदं स्तोत्रं गणेशस्य पठेच्च सादरं नरः ।

तस्य वाञ्छितकामस्य सिद्धिर्भवति निश्चितम् ॥ १५॥


इति श्रीवरदगणेशाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

108 नामों का श्लोकवार विस्तृत हिंदी अर्थ

श्लोक १: गणेश, विघ्नराज (विघ्नों के राजा), विघ्नहर्ता, गणाधिप (गणों के स्वामी), लंबोदर (बड़े उदर वाले), वक्रतुण्ड (टेढ़ी सूंड वाले), विकट (विशाल शरीर वाले), गणनायक (गणों के नेता)।

श्लोक २: गजास्य (हाथी के मुख वाले), सिद्धिदाता (सिद्धि देने वाले), खर्व (छोटे कद वाले), मूषकवाहन (चूहे की सवारी करने वाले), मूषक, गणराज, शैलजानन्ददायक (पार्वती को आनंद देने वाले)।

श्लोक ३: गुहाग्रज (कार्तिकेय के बड़े भाई), महातेजा (महान तेजस्वी), कुब्ज, भक्तप्रिय, प्रभु, सिन्दूराभ (सिंदूर के समान कांति वाले), गणाध्यक्ष, त्रिनेत्र (तीन नेत्रों वाले), धनदायक।

श्लोक ४: वामन, शूर्पकर्ण (सूप के समान कानों वाले), धूम्र (धूसर वर्ण वाले), शंकरनंदन (शिव-पुत्र), सर्वार्तिनाशक (समस्त पीड़ाओं का नाश करने वाले), विज्ञ (ज्ञानी), कपिल, मोदकप्रिय।

श्लोक ५: संकष्टनाशन (संकट का नाश करने वाले देव), सुरासुरनमस्कृत (देव-असुर दोनों द्वारा नमस्कृत), उमासुत, कृपालु, सर्वज्ञ, प्रियदर्शन (देखने में प्रिय)।

श्लोक ६: हेरम्ब, रक्तनेत्र (लाल नेत्रों वाले), स्थूलमूर्ति, प्रतापवान, सुखद, कार्यकर्ता (कार्य पूर्ण करने वाले), बुद्धिद (बुद्धि देने वाले), व्याधिनाशक (रोग-नाशक)।

श्लोक ७: इक्षुदण्डप्रिय (गन्ना प्रिय), शूर, क्षमायुक्त, अघनाशक (पाप-नाशक), एकदन्त, महोदार (अत्यंत उदार), सर्वद (सब कुछ देने वाले), गजकर्षक।

श्लोक ८: विनायक, जगत्पूज्य, फलद (फल देने वाले), दीनवत्सल (दीनों पर स्नेह रखने वाले), विद्याप्रद, महोत्साह, दुःखदौर्भाग्यनाशक (दुख और दुर्भाग्य का नाश करने वाले)।

श्लोक ९: मिष्टप्रिय (मिठाई प्रिय), भालचन्द्र (मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले), नित्यसौभाग्यवर्धन (सौभाग्य बढ़ाने वाले), दानपूरार्द्रगण्ड (दान की धारा से भीगे कपोल वाले), विबुधप्रिय (देवताओं के प्रिय)।

श्लोक १०: रक्ताम्बरधर (लाल वस्त्र धारण करने वाले), श्रेष्ठ, सुभग, नागभूषण (सर्प-आभूषण धारण करने वाले), शत्रुध्वंसी, चतुर्बाहु (चार भुजाओं वाले), सौम्य, दारिद्र्यनाशक।

श्लोक ११: आदिपूज्य (सर्वप्रथम पूज्य), दयाशील, रक्तमुण्ड, महोदय, सर्वग (सर्वव्यापी), सौख्यकृत् (सुख देने वाले), शुद्ध, बुधप्रिय (विद्वानों के प्रिय)।

श्लोक १२: सर्वदेवमय, शांत, भुक्तिमुक्तिप्रदायक (भौतिक सुख और मोक्ष दोनों देने वाले), विद्यावान्, दानशील, वेदविद् (वेद-ज्ञाता), मंत्रविद् सुधी (मंत्र-ज्ञानी बुद्धिमान)।

श्लोक १३: अविज्ञातगति (जिनकी गति अज्ञात है), ज्ञानी, ज्ञानिगम्य (ज्ञानियों द्वारा प्राप्त होने योग्य), मुनिस्तुत, योगज्ञ, योगपूज्य, भालनेत्र (मस्तक पर नेत्र वाले), शिवात्मज।

श्लोक १४: सर्वमंत्रमय, श्रीमान्, अवश (स्वतंत्र, किसी के वश में न रहने वाले), वशकारक (सबको वश में करने वाले), विघ्नध्वंसी, सदा हृष्ट (प्रसन्न), भक्तों को फल देने वाले।

श्लोक १५ (फलश्रुति): जो मनुष्य गणेश जी के इस स्तोत्र को श्रद्धापूर्वक पढ़ता है, उसकी मनचाही कामनाओं की सिद्धि निश्चित रूप से होती है।

इस प्रकार यह श्रीवरदगणेशाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र सम्पूर्ण होता है।

इस स्तोत्र की विशेषता — भौतिक और आध्यात्मिक दोनों लाभों का समन्वय

इस 108-नाम स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें गणेश जी के भौतिक-दाता स्वरूप (धनदायक, सुखद, दारिद्र्यनाशक, दुःखदौर्भाग्यनाशक) और आध्यात्मिक स्वरूप (योगज्ञ, ज्ञानी, वेदविद्, भुक्तिमुक्तिप्रदायक) — दोनों को समान महत्व दिया गया है। यह दर्शाता है कि वरदविनायक की कृपा केवल सांसारिक इच्छाओं तक सीमित नहीं, बल्कि यह साधक को आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी ले जाती है। फलश्रुति में स्पष्ट "वाञ्छितकामस्य सिद्धिर्भवति निश्चितम्" कहकर इस स्तोत्र को निश्चित इच्छा-पूर्ति देने वाला घोषित किया गया है।

वरद गणेश स्तोत्र पाठ की सही विधि

  1. समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात, विशेषकर बुधवार और संकष्टी चतुर्थी के दिन इसका पाठ श्रेष्ठ माना जाता है।
  2. भाव: फलश्रुति में "सादरं" अर्थात आदरपूर्वक पढ़ने पर बल दिया गया है — इसलिए श्रद्धा और आदर के भाव के साथ पाठ करें।
  3. पूजन सामग्री: गणेश प्रतिमा के समक्ष दीप जलाकर, लाल पुष्प और मोदक अर्पित करते हुए इसका पाठ करना पारंपरिक विधि है।
  4. मनोकामना के साथ: पाठ आरंभ करने से पूर्व अपनी विशेष इच्छा या कामना का संकल्प लेकर इसे पढ़ना अधिक फलदायी माना जाता है।
  5. महड यात्रा के साथ: यदि संभव हो, तो अष्टविनायक के महड स्थित वरदविनायक मंदिर की यात्रा के दौरान इस स्तोत्र का पाठ विशेष शुभ है।

यह स्तोत्र किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है

  • मनोकामना-पूर्ति हेतु: फलश्रुति के अनुसार यह किसी भी वांछित इच्छा की निश्चित सिद्धि प्रदान करने वाला माना जाता है।
  • धन और दारिद्र्य-निवारण हेतु: "धनदायक" और "दारिद्र्यनाशक" जैसे नाम इसे आर्थिक समस्याओं में विशेष उपयुक्त बनाते हैं।
  • रोग और दुर्भाग्य से मुक्ति हेतु: "व्याधिनाशक" और "दुःखदौर्भाग्यनाशक" नाम स्वास्थ्य और सौभाग्य संबंधी समस्याओं में सहायक हैं।
  • विद्या और बुद्धि-प्राप्ति हेतु: "विद्याप्रद" और "बुद्धिद" नामों के अनुसार यह विद्यार्थियों के लिए भी उपयुक्त है।
  • आध्यात्मिक उन्नति हेतु: "भुक्तिमुक्तिप्रदायक" के अनुसार यह मोक्ष-मार्ग के साधकों के लिए भी उतना ही उपयुक्त है।

जब स्वयं विधिवत पाठ करना संभव न हो

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निष्कर्ष

श्रीवरदगणेशाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् अपने 108 श्लोकबद्ध नामों के माध्यम से वरदविनायक के सम्पूर्ण स्वरूप — उनके रूप, गुण, शक्ति और वरदान-क्षमता — को समेटता है। यह स्तोत्र न केवल भौतिक इच्छाओं की पूर्ति का वरदान देता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। जो साधक श्रद्धा और आदरपूर्वक इसका नियमित पाठ करता है, उसकी हर वांछित कामना निश्चित रूप से पूर्ण होती है, जैसा स्वयं फलश्रुति में वर्णित है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: वरदविनायक कौन हैं और वे किस स्थान से जुड़े हैं? वरदविनायक भगवान गणेश का "वरदान देने वाला" स्वरूप है, जो महाराष्ट्र के महड (महाड) में विराजमान हैं। यह अष्टविनायक यात्रा के आठ पवित्र स्थानों में से एक है, और इनके दर्शन-मात्र से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है।

प्रश्न 2: यह स्तोत्र अन्य गणेश अष्टोत्तरशतनामावली से किस प्रकार भिन्न है? सामान्य नामावली में प्रत्येक नाम के साथ अलग से "ॐ...नमः" जोड़ा जाता है, जबकि यह स्तोत्र सभी 108 नामों को पंद्रह काव्यात्मक श्लोकों में पिरोता है, जिससे इसका पाठ अधिक प्रवाहमय, सरल और गेय (गाने योग्य) बन जाता है।

प्रश्न 3: इस स्तोत्र की फलश्रुति में क्या वरदान दिया गया है? फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है — "तस्य वाञ्छितकामस्य सिद्धिर्भवति निश्चितम्" अर्थात जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करता है, उसकी मनचाही कामना की सिद्धि निश्चित रूप से होती है।

प्रश्न 4: इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? प्रातःकाल स्नान के पश्चात, विशेषकर बुधवार और संकष्टी चतुर्थी के दिन आदरपूर्वक इसका पाठ करना चाहिए। पाठ से पूर्व अपनी विशेष कामना का संकल्प लेना अधिक फलदायी माना जाता है।

प्रश्न 5: यह स्तोत्र किन-किन समस्याओं में सहायक है? यह स्तोत्र धन-समृद्धि, रोग-निवारण, दुर्भाग्य-नाश, विद्या-प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति — इन सभी क्षेत्रों में सहायक माना जाता है, क्योंकि इसमें गणेश जी के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्वरूपों का समान महत्व से वर्णन किया गया है।

अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

लेखक: Admin

श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती

प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026

स्थिति: प्रकाशित