
यमकृत गणेश स्तुति: जब स्वयं मृत्यु के देवता को भी गणपति की शरण लेनी पड़ी
मुद्गल पुराण में वर्णित यमकृता श्रीगणेशस्तुतिः का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और महत्व जानें। स्वयं यमराज के संकट-मोचन की कथा और गणेश तीर्थ की उत्पत्ति का रहस्य।
Yamakrita Ganesh Stuti: When Even the God of Death Sought Refuge in Ganapati
जब यमराज स्वयं संकट में पड़ गए
यह अत्यंत रोचक और असाधारण प्रसंग है — यमराज, जो स्वयं मृत्यु और न्याय के देवता हैं, जिनसे संसार का हर प्राणी भयभीत रहता है, वे स्वयं एक संकट में पड़ गए और उन्हें गणपति की शरण लेनी पड़ी। यमकृता श्रीगणेशस्तुतिः मुद्गल पुराण के द्वितीय खंड के 59वें अध्याय में वर्णित यह प्रसंग बताता है कि कैसे सूर्यपुत्र यमराज ने अपनी माता (छाया) के शाप से उत्पन्न कष्ट से मुक्ति पाने के लिए गणेश जी की स्तुति की, और कैसे इसी प्रसंग से एक पवित्र तीर्थ — "गणेश तीर्थ" — की उत्पत्ति हुई।
यह स्तुति चौबीस श्लोकों में फैली हुई है, और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल स्तुति तक सीमित नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण कथा — संकट, स्तुति, वरदान, शाप-निवारण और तीर्थ-उत्पत्ति — को समेटे हुए है।
यमकृता श्रीगणेशस्तुतिः — सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिंदी अर्थ सहित
स्तुति का आरंभ
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
यम उवाच ।
नमो गणपते तुभ्यं नानामायाविलासिने ।
मायाधारकवेषेण स्थिताय तु नमो नमः ॥ २२॥
मायामोहविहीनाय साक्षिणे जगदादये ।
ब्रह्मादये ब्रह्मविदे ब्रह्मणे वै नमो नमः ॥ २३॥
अनन्ताय नमस्तुभ्यं हेरम्बाय च ढुण्ढये ।
विघ्नेशाय त्रिनेत्राय लम्बोदर नमोऽस्तु ते ॥ २४॥
गजाननाय देवाय देवानां पतये नमः ।
देवानां गर्वहन्त्रे च रक्षसां मर्दिने नमः ॥ २५॥
भक्तिप्रियाय भक्तेभ्यो नानासौख्यप्रदाय ते ।
अनन्ताननधारायानन्तहस्ताय ते नमः ॥ २६॥
अनन्तशिरसे तुभ्यं ब्रह्मभूताय वेधसे ।
शिवाय शिववन्द्याय शिवदाय नमो नमः ॥ २७॥
अखण्डविभवायैव मूषकध्वजिने नमः ।
मूषकश्रेष्ठवाहस्थायैकदन्ताय ते नमः ॥ २८॥
आदिमध्यान्तरूपाय सर्वाकाराय ते नमः ।
पाशाङ्कुशधरायैव सर्वभोक्त्रे नमो नमः ॥ २९॥
त्वां स्तोतुं कः समर्थः स्याद्योगाकारस्वरूपिणम् ।
अतोऽहं प्रणमामीह तेन तुष्टो भव प्रभो ॥ ३०॥
धन्योऽहं सर्वभावैश्च येन दृष्टो गणेश्वरः ।
अधुना रक्ष मां भक्तं शरणागतवत्सल ॥ ३१॥
हिंदी अर्थ: यमराज ने कहा — हे गणपति! आपको नमस्कार है, जो अनेक मायाओं की लीला रचते हैं। माया-रूपी वेष धारण करके स्थित रहने वाले आपको बारंबार नमस्कार है। जो माया और मोह से रहित हैं, जो सबके साक्षी हैं, जो जगत के आदि-कारण हैं, जो ब्रह्मा के भी आदि हैं, जो ब्रह्म को जानने वाले हैं, जो साक्षात ब्रह्म हैं — आपको नमस्कार है। हे अनंत! हे हेरम्ब! हे ढुण्ढि! हे विघ्नेश! हे त्रिनेत्र! हे लम्बोदर! आपको नमस्कार है। गजानन देव को, देवताओं के स्वामी को नमस्कार है। देवताओं का गर्व हरने वाले और राक्षसों का मर्दन करने वाले को नमस्कार है। भक्ति-प्रिय, भक्तों को अनेक सुख देने वाले, अनंत मुख और अनंत भुजाओं वाले आपको नमस्कार है। अनंत मस्तकों वाले, ब्रह्म-स्वरूप, विधाता, शिव-स्वरूप, शिव द्वारा वंदित, कल्याण देने वाले आपको बारंबार नमस्कार है। अखंड ऐश्वर्य वाले, मूषक-ध्वजा वाले, श्रेष्ठ मूषक-वाहन पर स्थित एकदंत को नमस्कार है। आदि-मध्य-अंत स्वरूप, सर्वाकार, पाश-अंकुश धारण करने वाले, सबके भोक्ता आपको बारंबार नमस्कार है। आपकी स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है, जो योग के साक्षात स्वरूप हैं? इसलिए मैं केवल प्रणाम करता हूं, हे प्रभु! इसी से आप प्रसन्न हों। मैं सब प्रकार से धन्य हूं, जिसने गणेश्वर के दर्शन किए। हे शरणागतवत्सल! अब मुझ भक्त की रक्षा कीजिए।
वरदान और शाप-निवारण की कथा
एवं स्तुवन्तमत्यन्तमुवाच गणनायकः ।
यमं परमभक्तं च सूर्यपुत्रं यशस्विनम् ॥ ३२॥
गणेश उवाच ।
वरं वृणु महाभाग यम त्वं मनसीप्सितम् ।
दास्यामि ते महाभक्त्या तोषितोऽहं न संशयः ॥ ३३॥
ततस्तं भानुजस्तत्रोवाच देहि गजानन ।
भक्तिं त्वदीयपादे वै सुदृढां मे महोदर ॥ ३४॥
अन्यं वरं च मे देहि मातृशापहरं परम् ।
यद्यदिच्छामि देवेश तत्तत् सिध्यतु विघ्नप ॥ ३५॥
एवं तस्य वचः श्रुत्वा तथेति गणपोऽब्रवीत् ।
मदीया ते महाभक्तिर्भविष्यति न संशयः ॥ ३६॥
मातृशापस्य योगेन किञ्चिद् दुःखमवाप्स्यसि ।
क्लेद्यपादाच्च मांसं ते कीटाः सङ्गृह्य सत्वरम् ॥ ३७॥
पतिष्यन्ति पृथिव्यां ते त्वं सुपादो भविष्यसि ।
यद्यदिच्छसि तत्तत्ते सुलभं प्रभविष्यति ॥ ३८॥
दक्षिणस्यां दिशि प्राज्ञ दिक्पालस्त्वं भविष्यसि ।
धर्मराज इति ख्यातो नाम्ना सर्वत्र पूजितः ॥ ३९॥
स्वधर्मपालकेषु त्वं श्रेष्ठो धर्मकरो मतः ।
जीवानां कर्मयोगेन फलदश्च भविष्यसि ॥ ४०॥
हिंदी अर्थ: इस प्रकार अत्यंत भक्तिभाव से स्तुति करते हुए यम को, जो यशस्वी सूर्यपुत्र और परम भक्त थे, गणनायक ने संबोधित किया। गणेश जी ने कहा — "हे महाभाग यम! जो भी तुम्हारे मन में इच्छित हो, वह वर मांगो। तुम्हारी महाभक्ति से प्रसन्न होकर मैं वह अवश्य दूंगा, इसमें संदेह नहीं।" तब सूर्यपुत्र यम ने कहा — "हे गजानन! मुझे अपने चरणों में सुदृढ़ भक्ति प्रदान कीजिए, हे महोदर! और मुझे एक अन्य वर भी दीजिए — मेरी माता के शाप का सर्वोत्तम निवारण। हे देवेश! हे विघ्नप! मैं जो-जो चाहूं, वह सब सिद्ध हो।" उसके इन वचनों को सुनकर गणपति ने "तथास्तु" कहा — "मेरी महाभक्ति तुम्हें अवश्य प्राप्त होगी, इसमें संदेह नहीं। माता के शाप के प्रभाव से तुम्हें थोड़ा दुख अवश्य प्राप्त होगा — तुम्हारे गलते हुए पैर से मांस को कीड़े शीघ्र ही एकत्र करके पृथ्वी पर गिरा देंगे, और तुम स्वस्थ पैर वाले हो जाओगे। तत्पश्चात जो-जो तुम चाहोगे, वह सब सुलभ हो जाएगा। हे प्राज्ञ! तुम दक्षिण दिशा के दिक्पाल बनोगे, और 'धर्मराज' नाम से सर्वत्र पूजित होगे। स्वधर्म-पालकों में तुम सबसे श्रेष्ठ धर्म-रक्षक माने जाओगे, और जीवों को उनके कर्मानुसार फल देने वाले बनोगे।"
फलश्रुति और गणेश तीर्थ की उत्पत्ति
त्वदीयाऽऽज्ञा त्रिलोकेषु वर्ततां धर्मभावतः ।
त्वया स्तोत्रमिदं पुण्यं कृतं तच्च सुसिद्धिदम् ॥ ४१॥
पठते शृण्वते पूर्णं भविष्यति न संशयः ।
यमस्य यातनां घोरां स्तोत्रेण प्रस्तुतो यम ॥ ४२॥
हरामि नात्र सन्देहोंऽते स्वानन्दं ददाम्यहम् ।
त्वया यत्र कृतं स्नानं नित्यं मद्भक्तिभाविना ॥ ४३॥
गणेशतीर्थसंज्ञं तद्भविष्यति न संशयः ।
अत्रैव स्नानमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत् ॥ ४४॥
सुबुद्धिप्रदमेतच्च तत्क्षणात् प्रभविष्यति ।
एवमुक्त्वान्तर्दधेऽसौ यमस्तत्र स्थितोऽभवत् ॥ ४५॥
इति यमकृता श्रीगणेशस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
हिंदी अर्थ: तुम्हारी आज्ञा तीनों लोकों में धर्म-भाव से चले। तुम्हारे द्वारा रचित यह पुण्य स्तोत्र सुसिद्धि प्रदान करने वाला होगा। इसे पढ़ने और सुनने वाले को यह पूर्ण फल अवश्य देगा। हे यम! इस स्तोत्र के माध्यम से यमराज (नरक) की घोर यातना को मैं दूर करूंगा, इसमें कोई संदेह नहीं — अंत में मैं अपना ही आनंद प्रदान करूंगा। जिस स्थान पर तुमने मेरी भक्ति में लीन होकर नित्य स्नान किया है, वह स्थान 'गणेश तीर्थ' के नाम से प्रसिद्ध होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। यहां केवल स्नान करने मात्र से समस्त पापों का नाश होगा, और यह तत्काल सद्बुद्धि प्रदान करने वाला होगा। इतना कहकर गणेश जी अंतर्ध्यान हो गए, और यम वहीं स्थित रहे।
इस प्रकार यह यमकृत श्री गणेश स्तुति सम्पूर्ण होती है।
इस स्तुति का गहरा संदेश — कष्ट के भीतर छिपा वरदान
इस कथा की सबसे मार्मिक बात यह है कि गणेश जी यम की माता के शाप को पूर्णतः निरस्त नहीं करते, बल्कि उसे एक सकारात्मक परिणाम में बदल देते हैं — "मातृशापस्य योगेन किञ्चिद् दुःखमवाप्स्यसि" अर्थात शाप का प्रभाव थोड़ा कष्ट अवश्य देगा (पैर में पीड़ा), परंतु उसी प्रक्रिया के अंत में यम को स्वस्थ पैर और महान पद (धर्मराज, दक्षिण दिशा के दिक्पाल) की प्राप्ति होती है। यह हमें एक गहरा जीवन-सिद्धांत सिखाता है — कभी-कभी जीवन का संकट पूर्णतः टाला नहीं जा सकता, परंतु सच्ची भक्ति और शरणागति से उस संकट को भी एक उच्चतर उद्देश्य और वरदान में बदला जा सकता है।
यमकृत गणेश स्तुति पाठ की सही विधि
- समय: प्रातःकाल अथवा किसी गंभीर संकट, भय या अनिष्ट-शंका के समय इस स्तुति का पाठ विशेष सांत्वना देता है।
- भाव: यमराज जैसे शक्तिशाली देवता की भी विनम्र शरणागति का स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
- पूजन सामग्री: गणेश प्रतिमा के समक्ष दीप जलाकर, लाल पुष्प अर्पित करते हुए इसका पाठ करना पारंपरिक विधि है।
- मृत्यु-भय और पितृ-संबंधी चिंता में: चूंकि यह स्तुति यमराज से जुड़ी है, इसे मृत्यु-भय, यमलोक की चिंता या पितरों के कल्याण की कामना के साथ भी पढ़ा जाता है।
यह स्तुति किन परिस्थितियों में विशेष लाभकारी है
- गंभीर संकट और शाप-निवारण में: यह स्तुति दर्शाती है कि गणेश जी सबसे कठिन शाप और संकट को भी वरदान में बदल सकते हैं।
- मृत्यु-भय और यमलोक-यातना से मुक्ति हेतु: फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि यह स्तोत्र यम की घोर यातना को दूर करने वाला है।
- पाप-मुक्ति हेतु: "गणेश तीर्थ" में स्नान और इस स्तोत्र के पाठ से समस्त पापों का नाश होने की बात कही गई है।
- सद्बुद्धि-प्राप्ति हेतु: "सुबुद्धिप्रदमेतच्च तत्क्षणात्" के अनुसार यह तत्काल सद्बुद्धि प्रदान करने वाला भी माना जाता है।
जब स्वयं विधिवत पाठ करना संभव न हो
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निष्कर्ष
यमकृता श्रीगणेशस्तुतिः इस बात का गहरा प्रमाण है कि गणेश जी की शरण किसी के लिए भी वर्जित नहीं — चाहे वह साधारण भक्त हो या स्वयं मृत्यु के देवता यमराज। यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन के सबसे कठिन संकट, यहां तक कि मातृ-शाप जैसी अपरिहार्य परिस्थितियां भी, सच्ची भक्ति और शरणागति के माध्यम से एक उच्चतर वरदान में बदल सकती हैं। इसी प्रसंग से उत्पन्न "गणेश तीर्थ" आज भी पाप-मुक्ति और सद्बुद्धि-प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: यमकृत गणेश स्तुति किस ग्रंथ से लिया गया है? यह स्तुति मुद्गल पुराण के द्वितीय खंड के 59वें अध्याय में वर्णित है, और इसे स्वयं यमराज (सूर्यपुत्र) ने अपनी माता के शाप से उत्पन्न कष्ट से मुक्ति पाने के लिए रचा था।
प्रश्न 2: यमराज को गणेश जी की शरण क्यों लेनी पड़ी? कथा के अनुसार यमराज अपनी माता के शाप से उत्पन्न पीड़ा (पैर में कष्ट) से त्रस्त थे। इसी संकट से मुक्ति पाने और भक्ति प्राप्त करने के लिए उन्होंने गणेश जी की स्तुति की।
प्रश्न 3: गणेश तीर्थ की उत्पत्ति कैसे हुई? गणेश जी ने वरदान दिया कि जिस स्थान पर यमराज ने भक्तिपूर्वक नित्य स्नान किया, वह स्थान "गणेश तीर्थ" के नाम से प्रसिद्ध होगा, जहां स्नान मात्र से समस्त पापों का नाश और सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।
प्रश्न 4: इस स्तुति का सबसे गहरा संदेश क्या है? इस स्तुति का सबसे गहरा संदेश यह है कि गणेश जी शाप या संकट को पूर्णतः नहीं मिटाते, बल्कि उसे एक उच्चतर वरदान में बदल देते हैं — जैसे यम को अस्थायी कष्ट के बाद स्वस्थता और "धर्मराज" जैसा महान पद प्राप्त हुआ।
प्रश्न 5: इस स्तुति के पाठ से क्या लाभ मिलते हैं? फलश्रुति के अनुसार यह स्तोत्र यमलोक की घोर यातना को दूर करने वाला, समस्त पापों का नाश करने वाला और तत्काल सद्बुद्धि प्रदान करने वाला है, विशेषकर मृत्यु-भय और पितृ-संबंधी चिंताओं में सहायक माना जाता है।
अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। कृपया व्यक्तिगत निर्णय से पूर्व योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।
लेखक: Admin
श्रेणी: मंत्र, स्तोत्र और आरती
प्रकाशन तिथि: 18 सितंबर 2026
स्थिति: प्रकाशित
